गुजरात के एक गांव में जहरीली शराब पीने से नौ लोगों की मौत ने एक बार फिर अवैध रूप से चल रहे नशे के कारोबार पर रोक लगाने और शराबबंदी, नशाबंदी संबंधी तैयारियों पर सवालिया निशान लगाया है। गुजरात में दशकों से शराब की बिक्री पर प्रतिबंध है और इस मामले में दूसरे राज्यों की अपेक्षा वहां प्रशासन को अधिक मुस्तैद माना जाता है। फिर भी अगर वहां जहरीली शराब पीने से नौ लोगों की मौत हो गई, तो यह राज्य प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है। पिछले महीने बिहार में भी जहरीली शराब पीने से कई लोगों के दम तोड़ देने की खबर आई थी। जांच से पता चला कि वहां न सिर्फ पड़ोसी राज्यों से अवैध शराब का कारोबार फल-फूल रहा है, बल्कि लोग चोरी से शराब बना कर बेच और पी रहे हैं। शराब का चलन पिछले कुछ सालों में देश के हर हिस्से में बढ़ा है। जहां शराब की बिक्री पर पाबंदी नहीं है, वहां के आंकड़े बताते हैं कि हर महीने हजारों की संख्या में नए पीने वाले बढ़ जाते हैं। इसलिए वहां नए ठेकों के लाइसेंस देने की जरूरत पड़ती है।

ऐसे में शराबबंदी वाले राज्यों में अवैध शराब की बिक्री का अंदेशा हमेशा बना रहता है। शराब माफिया ऐसी जगहों पर अपने पांव पसारना शुरू कर देते हैं। हरियाणा में शराबबंदी के अनुभवों से ये बातें उजागर हैं। हालांकि गुजरात में बहुत पहले से शराबबंदी है, इसलिए वहां लोगों में उस तरह पीने की लत नहीं है, जैसी दूसरे राज्यों में देखी जाती है। मगर पिछले कुछ सालों में जिस तरह देश भर में शराब पीना फैशन का रूप लेता गया है और उसे लेकर पारंपरिक सामाजिक निषेध-भाव लगातार ढीला हुआ है, उसका असर निस्संदेह गुजरात पर भी पड़ रहा है। वहां शराब माफिया इसी का लाभ उठा रहे हैं।

अवैध शराब के कारोबार की जड़ें सिर्फ उन राज्यों में नहीं फैली हैं, जहां इसकी बिक्री पर पाबंदी है। उन राज्यों में यह खूबफल-फूल रहा है, जहां शराबबंदी नहीं है। चूंकि शराब की बिक्री से जुड़े नियम-कायदे और इस पर करों का निर्धारण राज्य सरकारें करती हैं, इसलिए अलग-अलग राज्यों में इनकी दरें भिन्न हैं। जिन राज्यों में वैध शराब की कीमत अधिक है, वहां देसी तरीके से शराब बना कर चोरी-छिपे बेचने का धंधा खूब फैला हुआ है। देसी शराब की गुणवत्ता जांचने का कोई पैमाना नहीं होता, इसलिए इसे बनाने वाले इसमें ऐसे घातक रसायन भी डालने से बाज नहीं आते, जो नशा तो खूब करते हैं, पर शरीर को गंभीर खतरे में डाल सकते हैं। कई बार जब ऐसे रसायनों की मात्रा अनियंत्रित हो जाती है तो वह लोगों की मृत्यु का कारण भी बनती है। शायद ही कोई ऐसा राज्य है, जहां से लोगों के जहरीली शराब पीने की वजह से जान गंवाने की खबरें न आती हों। मगर हैरानी की बात है कि इस तरह शराब बनाने और बेचने वालों पर अंकुश लगाने में सरकारें विफल साबित होती हैं। अवैध शराब बनाने वालों के बारे में पता लगाना प्रशासन के लिए मुश्किल काम नहीं है। बल्कि इसके अनेक उदाहरण हैं कि शराब माफिया पुलिस से सांठगांठ करके शराब या दूसरे प्रकार के नशीले पदार्थों का कारोबार चलाते हैं। शराबबंदी या फिर नशामुक्ति के प्रयास सिर्फ सिद्धांत के तौर पर चलाने से लक्ष्य तक पहुंचना संभव नहीं होगा। इसके लिए प्रशासन को जवाबदेह बनाना जरूरी है।