काले धन से पार पाने के प्रयास में प्रधानमंत्री ने अब जनधन खाताधारकों से सहयोग की अपील की है। मुरादाबाद में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जिन लोगों के खातों में काला धन रखने वालों ने धोखे से पैसे जमा कराए हैं, उन्हें बिल्कुल न निकालें। ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें दंडित करने और काला धन गरीबों के खाते में डालने के उपाय सोचे जा रहे हैं। दरअसल, नोटबंदी के फैसले के बाद जनधन खातों में पैसे जमा कराने की दर में अचानक वृद्धि दर्ज हुई है। अब तक करीब उनतीस हजार करोड़ रुपए इन खातों में जमा कराए जा चुके हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने बार-बार अपील की थी कि कोई भी व्यक्ति दूसरे का पैसा अपने खाते में न जमा कराए, पर ऐसा न हो सका। इसलिए प्रधानमंत्री ने जनधन खाताधारकों से एक बार फिर सहयोग की अपील की है। मगर इसका कितना असर होगा, कहना मुश्किल है। नोटबंदी के बाद से किस तरह काले धन को सफेद बनाने के प्रयास हो रहे हैं, इसके कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। ताजा उदाहरण गुजरात के एक कारोबारी का है, जिसने करीब चौदह हजार करोड़ रुपए को सफेद करने की कोशिश की।
दरअसल, काले धन को सामने लाने के लिए आजमाए जा रहे उपाय व्यावहारिक न होने के कारण इस तरह की कोशिशें देखी जा रही हैं। सरकार ने नियम बनाया कि अगर लोग स्वेच्छा से अपनी गैरकानूनी तरीके से कमाई रकम की घोषणा करते हैं, तो घोषित आय का आधा हिस्सा सरकारी खजाने में डाल दिया जाएगा। पचीस फीसद हिस्सा चार साल के लिए गरीबों की भलाई के लिए बने कोष में रखा जाएगा और बाकी पचीस फीसद रकम को सफेद करार दे दिया जाएगा। इसलिए भी बहुत सारे लोगों में काले धन की घोषणा को लेकर जो हिचक बनी हुई थी, वह दूर हो गई। गुजरात का कारोबारी इसीलिए सामने आया। इसी तरह जनधन खातों में कई बार पचास हजार रुपए से कम रकम जमा करा कर लोगों ने काले धन को सफेद करने का रास्ता निकाला।
प्रधानमंत्री की अपील पर जनधन खाताधारक कितना सहयोग कर पाएंगे, कहना मुश्किल है। ऐसे खाताधारक अपने आसपास के लोगों से प्रभावित होते हैं। उन्हें लोभ देकर अपने खातों में पुराने पैसे जमा कराने को उकसाया गया होगा। जिस तरह बहुत सारे लोगों ने कतार में खड़े होकर कमीशन पर पुराने के बदले नया नोट हासिल करने की कोशिश की, उसी तरह जनधन खाताधारक भी लोभ में आए होंगे। यह भी छिपी बात नहीं है कि कई जगह बैंक कर्मचारियों ने भी कमीशन लेकर पुराने के बदले लोगों को नए नोट दिए। इसलिए जनधन खाताधारक उन लोगों के नाम सहज ही उजागर कर देंगे या फिर प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर बताएंगे, विश्वास करना मुश्किल है। काले धन को सफेद करने के प्रयास सिर्फ जनधन खातों के जरिए नहीं हुई। पेट्रोल पंपों, गैस एजंसियों, गन्ना मिलों, सार्वजनिक परिवहन के कर्मचारियों आदि ने भी इसमें बहुत हद तक लोगों की मदद की। उनकी पहचान का क्या उपाय है। नोटबंदी के जरिए पचासी फीसद से अधिक मुद्रा को चलन से बाहर कर दिया गया, उसमें से कितने की पहचान काले धन के रूप में हो पाएगी, अभी सरकार को भी अंदाजा नहीं है। अब भी अगर लुभावने जुमलों के बजाय व्यावहारिक उपायों पर ध्यान दिया जाए, तो कुछ बेहतर नतीजे की उम्मीद की जा सकती है।
