तेरह मंजिला इमारत जितना ऊंचा और तीन सौ करोड़ रुपए की लागत से बना देश का सबसे बड़ा और शक्तिशाली स्वदेशी रॉकेट भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यानी जीएसएलवी-एमके 3 सोमवार को निर्धारित समय शाम पांच बजकर अट्ठाईस मिनट पर सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित कर दिया गया। ‘फैट बॉय’ उपनाम वाले इस यान का कुल वजन 460 टन यानी दो सौ हाथियों के बराबर है। इसमें चार टन के भारी-भरकम संचार उपग्रह जीसैट-19 को भेजा गया है। पच्चीस घंटे की उलटी गिनती पूरी होने के बाद इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की देखरेख में श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से छोड़ा गया। इसरो ने इसे ऐतिहासिक दिन करार दिया है, और ऐसा कहना कतई गलत नहीं है। इसे अंतरिक्ष में भारत की लंबी छलांग के तौर पर देखा जा रहा है।
इस कामयाबी का पहला और सबसे बड़ा लाभ देश को यह होगा कि भविष्य में अंतरिक्ष यात्री भेजे जा सकेंगे। इंटरनेट की गति बढ़ेगी। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है जी-सैट 19 प्रति सेकेंड चार गीगाबाइट डेटा देने में सक्षम है। यह पुराने छह-सात संचार उपग्रहों के बराबर है और इसकी उम्र तकरीबन पंद्रह साल होगी। इसरो के अध्यक्ष एएस किरण कुमार ने कहा है कि यह अब तक का सबसे बड़ा प्रयोग है। अगले डेढ़ साल के भीतर दो और संचार उपग्रहों-जीसैट-11 और जीसैट-20 को भी अंतरिक्ष में भेजने की योजना है। इससे पहले जीएसएलवी-एमके-2 के जरिए जब दो टन के उपग्रह को भेजा गया था तो इसरो ने प्रक्षेपण क्षमता तो विकसित कर ली थी, लेकिन रॉकेटों की डिजाइन में रूस का गहरा प्रभाव था। लेकिन इस प्रक्षेपण की सारी तकनीक भारत ने खुद विकसित की है। जैसा कि इसरो अध्यक्ष ने दावा किया है कि यह तकनीक उपग्रह प्रक्षेपित करने की भारत की क्षमता में कई गुना वृद्धि करेगी। असल में भारत ने शुरुआत में क्रायोजनिक तकनीक खरीदने के लिए रूस के साथ करार किया था, लेकिन 1990 के दशक के आरंभ में अमेरिका ने मिसाइल तकनीक नियंत्रण व्यवस्था (एमटीसीआर) का हवाला देते हुए इसमें रोड़ा अटका दिया था।
इसका असर यह हुआ कि रूस ने तकनीक तो नहीं दी, मगर छह क्रायोजनिक इंजन मुहैया कराए। भारत ने पिछले साल ही एमटीसीआर में प्रवेश किया है। इसरो ने रूसी इंजन के साथ पहला जीएसएलवी रॉकेट बनाया, लेकिन उसकी गति इतनी नहीं थी कि वह उपग्रह को कक्षा में प्रक्षेपित कर पाता। आखिरकार इसरो इस चुनौती से रूबरू हुआ कि वह अपनी तकनीक और इंजन खुद विकसित करे, जिसका नतीजा एमके-3 के रूप में सामने आया। इसकी सफलता से मानव मिशन की योजना को जल्द अमल में लाया जा सकेगा। जानकारों का कहना है कि हालांकि एमके-3 के निर्माण में देरी हुई है और इसे एक दशक पहले ही निर्मित हो जाना चाहिए था। लेकिन क्या यह बात कई और भी उपलब्धियों की बाबत नहीं कही जा सकती! जो हो, अब अपने भारी-भरकम उपग्रहों के लिए विदेशी रॉकेटों पर इसरो की निर्भरता खत्म हो गई है। वह अब दो से चार टन के संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने में सक्षम है। लिहाजा, अब भारत को इसके कारोबारी लाभ के बारे में भी सोचना चाहिए।

