इनफोसिस विवाद और उसकी जो परिणति हुई वह काफी दुखद है। यों तो कंपनी के संस्थापकों और बाद में आने वाले प्रबंधकों-निदेशकों के बीच तनातनी के उदाहरण और भी मिल जाएंगे, भारत ही नहीं, दूसरे देशों से भी। फिर भी, इनफोसिस विवाद कुछ खास है। भारत की दूसरे नंबर की आइटी कंपनी इनफोसिस को भारत में सूचना प्रौद्योगिकी की प्रगति के एक प्रतीक के तौर पर देखा जाता रहा है। यह एक तरह से स्टार्ट अप की भी एक मिसाल है, क्योंकि इसे कुछ सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने ही अपनी बचत के सहारे शुरू किया था। इसलिए इनफोसिस की सफलता की कहानी दूसरी कंपनियों के मुकाबले ज्यादा लुभावनी और रोमांचक रही है, और इसके सह संस्थापक रहे नारायण मूर्ति व नंदन नीलेकणि युवा उद्यमियों के लिए प्रेरणा-स्रोत रहे हैं। इनफोसिस को कॉरपोरेट प्रशासन तथा पारदर्शिता के प्रतिमान के तौर पर भी देखा जाता रहा है। इन सारी उपलब्धियों के बरक्स देखें, तो स्वाभाविक ही मन में यह प्रश्न उभरेगा कि क्या इनफोसिस का सुनहरा दौर बीत चुका है? इनफोसिस के पहले गैर-संस्थापक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और प्रबंध निदेशक विशाल सिक्का ने पिछले हफ्ते इन दोनों पदों से इस्तीफा दे दिया। बहुतों के लिए यह अप्रत्याशित था, क्योंकि उन्हें कंपनी के निदेशक मंडल का समर्थन हासिल था।
विशाल सिक्का फिलहाल कंपनी के कार्यकारी उपाध्यक्ष के पद पर रहेंगे। उनकी जगह इनफोसिस के मुख्य परिचालन अधिकारी यूबी प्रवीण राव को अंतरिम सीईओ बनाया गया है। विशाल सिक्का और नारायण मूर्ति के बीच करीब साल भर से तनातनी चल रही थी। करीब दो साल पहले इजराइल की आॅटोमेशन टेक्नोलॉजी कंपनी पनाया को खरीदे जाने के औचित्य और उसके लिए चुकाई गई कीमत पर मूर्ति ने सवाल उठाए थे। इसके अलावा, जिस तरह कुछ लोगों को नौकरी छोड़ने पर सिवरैंस पे के तौर पर भारी राशि दी गई उसे भी नारायण मूर्ति ने अनुचित ठहराया। उनका यह भी आरोप था कि कंपनी के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया में मानकों का पालन नहीं हो रहा है। इन सब बातों को लेकर उनके और सिक्का के बीच साल-डेढ़ साल से कटुता का दौर चल रहा था, लेकिन मीडिया में आ गए नारायण मूर्ति के एक ई-मेल ने टकराव को चरम पर पहुंचा दिया।
इस ई-मेल में नारायण मूर्ति ने इनफोसिस के स्वतंत्र निदेशकों के हवाले से कहा था कि सिक्का सीईओ के बजाय मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी पद के लिए अधिक उपयुक्त हैं। इससे आहत सिक्का ने इस्तीफा दे दिया, जबकि कंपनी के निदेशक मंडल ने उनका पक्ष लेते हुए नारायण मूर्ति के आरोपों को गलत और निराधार बताया है। यों नारायण मूर्ति के आरोपों की जांच कराई गई थी। पर वे उस जांच से संतुष्ट नहीं हुए; उन्होंने उस जांच की निष्पक्षता पर संदेह जताया और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की, जो नहीं मानी गई। इस तरह इनफोसिस का यह विवाद काफी उलझा हुआ लगता है। निदेशक मंडल और सिक्का की तरफ से देखें, तो नारायण मूर्ति के सवाल बेजा दखल की तरह दिखेंगे। पर नारायण मूर्ति का कहना है कि वे अपने या अपनी संतान के लिए कुछ नहीं मांग रहे हैं, उनकी चिंता मानकों की गिरावट को लेकर है। सिक्का और निदेशक मंडल के बयानों के मद््देनजर उन्होंने कहा है कि वे आरोपों का सही तरीके से, सही मंच पर और उचित समय पर जवाब देंगे। इससे लगता है कि विवाद आगे भी जारी रहेगा।

