चीन ने एक बार फिर दोहराया है कि डोकलाम से भारतीय सैनिकों के हटने पर ही भारत से कोई सार्थक बातचीत हो सकती है। इस शर्त के चलते गतिरोध की शीघ्र समाप्ति की उम्मीद को धक्का लगा है। विडंबना यह है कि चीन ने यह शर्त एक बार फिर तब दोहराई है जब डोकलाम विवाद के मद््देनजर भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल बेजिंग जाने वाले हैं। पहले जो भी तीखी बयानबाजी हुई हो, यह मौका उपयुक्त माहौल बनाने का है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी यही चाहता है, जिसका संकेत पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान में आया। ट्रंप ने भारत और चीन, दोनों को सीधे बातचीत की सलाह दी है। लेकिन बातचीत और युद्ध की धमकी, दोनों का कोई मेल नहीं हो सकता। डोभाल की बेजिंग में मौजूदगी के दौरान चीनी पक्ष के पास विस्तार से एक-एक पहलू पर भारत का पक्ष जानने, अपना पक्ष बताने और सुलह-समाधान का रास्ता निकालने का अवसर होगा। लेकिन चीन ने डोभाल के बेजिंग रवाना होने से दो दिन पहले कहा कि पहाड़ को हिलाया जा सकता है, पर चीनी सेना को नहीं। इस तरह का बयान भारत भी अपनी सेना के बारे में दे सकता है। पर उससे हल क्या निकलेगा?

चीन और भारत, दो बड़ी ताकतें हैं। दोनों के पास दुनिया की विशालतम सेनाएं हैं। दोनों के बीच, अगर दुर्भाग्य से, युद्ध छिड़ा तो वह किस हद तक जाएगा, यह अकल्पनीय है। बाकी दुनिया भी, खासकर वैश्विक अर्थव्यवस्था उससे अछूती नहीं बचेगी। इस सच्चाई का अहसास चीन को भी होगा। अगर चीन डोकलाम को लेकर लाल-पीला हो रहा है, तो शायद इसलिए कि वह इस क्षेत्र को अपने ढंग से परिभाषित करना चाहता है। चीन का आरोप है कि पिछले महीने भारत के सैनिकों ने उसकी सीमा में घुस कर सड़क का निर्माण-कार्य रोक दिया। जबकि भारत का कहना है कि यह इलाका भूटान का है और भूटान से सुरक्षा व मैत्री संबंधी संधि के नाते इस इलाके की सुरक्षा की जिम्मेवारी उसकी है। निर्माण-कार्य रोकने के साथ ही भारत के सैनिक उस जगह जम गए और सोलह जून से लगातार डटे हुए हैं, जबकि चीन उन्हें वहां से हटाने के चेतावनी भरे बयान देता रहता है। विडंबना यह है कि भारत-चीन की तीन हजार किलोमीटर से भी लंबी सीमा में सिक्किम सेक्टर ही है जिसे लेकर कोई विवाद नहीं रहा है; यह वास्तविक नियंत्रण रेखा का हिस्सा नहीं है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने के लिए बातचीत के बहुत सारे दौर चले।

इन वार्ताओं से कोई समाधान तो नहीं निकला, पर 2012 में यह सहमति जरूर बनी, और इसे एक समझौते का रूप दिया गया, कि यथास्थिति बनाए रखी जाएगी, और किसी विवाद की सूरत में, तीसरे पक्ष- भूटान- से राय-मशविरा करके हल निकाला जाएगा। क्या आज भूटान की बात सुनने के लिए चीन तैयार है? जाहिर है, चीन ने उस समझौते को ताक पर रख दिया है। यथास्थिति बनाए रखने की सहमति में यह बात शामिल थी कि कोई स्थायी निर्माण नहीं किया जाएगा। लेकिन गैर-विवादित तो क्या, विवाद वाले सीमाक्षेत्रों में भी चीन बरसों से धड़ल्ले से निर्माण-कार्य करता रहा है। इन गैर-रिहाइशी और दुर्गम क्षेत्रों में भारी वाहन जाने लायक सड़कें बनाने के पीछे उसकी मंशा अपने सैनिकों की तेज आवाजाही सुनिश्चित करने की ही होगी। पर अगर भारत अपने रणनीतिक हितों की फिक्र करता है, तो यह उसे गवारा नहीं है! डोकलाम विवाद को कूटनीतिक प्रयासों से ही सुलझाना सबसे अच्छा विकल्प है। डोभाल के बेजिंग जाने की यही अहमियत है।