रविवार को जूनियर हॉकी विश्व कप प्रतियोगिता में भारत की टीम ने जब बेल्जियम की टीम को मात दी तो यह देश के लिए कई मायनों में खास रहा। लंबे समय से हॉकी में भारत किसी बड़ी उपलब्धि की राह ताक रहा था, लेकिन खिताबी तमगे तक पहुंचना मुमकिन नहीं हो पाया था। इस बार हॉकी की जूनियर टीम ने यह कमाल कर दिखाया और देश को खुशी से झूमने का एक मौका तो दिया ही, आने वाले दिनों के लिए भी एक उम्मीद जगा दी। एक समय भारत की हॉकी टीम का दुनिया भर में जो जलवा था, उसे आज भी याद किया जाता है। लेकिन तमाम कवायदों के बावजूद वह पहचान फिर से हासिल करने की महज कोशिश ही जारी थी। बल्कि एकाध बार ऐसा भी हुआ कि किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जगह भी नहीं बन पाई। मसलन, 2008 में बेजिंग ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम जगह तक बनाने में नाकाम रही थी। तब खिलाड़ियों के प्रदर्शन से लेकर उनकी तैयारियों में संसाधनों की कमी तक के सवाल उठे थे।

अब ऐसा लगता है कि भारतीय हॉकी उन शिकायतों और अभावों के दौर से निकलने की कोशिश में है। जूनियर टीम ने बेल्जियम को कड़ी टक्कर में 2-1 से हरा दिया। लेकिन इससे पहले भी उसका प्रदर्शन शानदार रहा और प्रतियोगिता में वह एक भी मैच किसी से नहीं हारी। क्वार्टर फाइनल में स्पेन और सेमीफाइनल में आॅस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीमों से मैच जीतने में कामयाब रही। यह तीसरी बार है जब भारतीय खिलाड़ियों को जूनियर विश्व कप के फाइनल में पहुंचने का मौका मिला। लेकिन विश्वकप चैंपियन के रूप में कामयाबी उसे 2001 में आॅस्ट्रेलिया में ही मिल पाई थी। जाहिर है, पंद्रह साल बाद की यह जीत भारत के लिए बेहद अहम है। पिछले चार दशकों के दौरान भारत की सीनियर टीम ने सिर्फ एक बार 1975 में विश्व कप का खिताब जीता था। जूनियर टीम ने दो बार। इस बार एक बड़ी उपलब्धि यह रही है कि भारतीय हॉकी को कई ऐसे नए खिलाड़ी मिले जो भावी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के मद््देनजर उम्मीद बन कर उभरे हैं।

जिस तरह तेजतर्रार आक्रामक खेल के बूते भारतीय टीम ने यह खिताबी जीत हासिल की, उससे पिछले कुछ दशकों के दौरान विदेशी मैदानों पर टीम के सुरक्षात्मक खेल की छवि टूटी है। हालांकि हॉकी वैसे भी एक तेज गति का खेल है और इसमें सुरक्षात्मक मोर्चा संभालने के मुकाबले आक्रामक तेवर ज्यादा कारगर साबित होता है। शायद इन्हीं वजहों से हॉकी के विश्लेषक यह कहने को मजबूर हुए हैं कि अगर भारतीय टीम इसी शैली में खेलती रही तो हमारी हॉकी के सुनहरे दौर की वापसी हो सकती है। ऐसा कम देखा गया है कि क्रिकेट से इतर किसी खेल में बड़ी उपलब्धि को लेकर देश भर में एक उत्साह का माहौल बन जाए। लेकिन पिछले कुछ समय से भारत के खिलाड़ियों ने एथलेटिक्स से लेकर कुछ दूसरे खेलों में भी देश कानाम रोशन करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी। इस लिहाज से देखें तो हॉकी में जूनियर टीम की यह उपलब्धि उसी की एक कड़ी है। इससे यह भी साबित होता है कि अगर खिलाड़ियों की खोज और उन्हें तैयार करने के लिए पर्याप्त ध्यान दिया जाए, संसाधनों की कमी न होने दी जाए, तो एक बार फिर भारतीय हॉकी का सुनहरा दौर आ सकता है।