लोकतंत्र की सेहत का एक पैमाना राजनीति की भाषा भी है। इस कसौटी पर हमारे देश की पार्टियां और उनका नेतृत्व करने वाले लोग कहां ठहरते हैं? इस सवाल का जवाब खोजने चलें तो अक्सर हमें निराशा ही हाथ लगेगी। अगर चुनाव के दिन हों तो राजनीति की भाषा में गिरावट और साफ नजर आएगी। ऐसा क्यों होता है? इसका एक कारण तो राजनीति की प्रकृति में है जिसमें खुद को औरों से बेहतर होने, दूसरों को खोटा सिद्ध करने और अपने को एकमात्र विकल्प बताने की होड़ हमेशा चलती रहती है। अगर यह आत्मविश्वास न हो कि हम औरों से बेहतर हैं, तो संगठित होने का बौद्धिक और भावनात्मक आधार ही टूट जाएगा। लेकिन खुद को औरों से बेहतर मानने के साथ-साथ आत्म-निरीक्षण भी जरूरी है, वरना आत्मविश्वास खोखले दंभ में बदल जाता है और फिर वही हर तरफ दिखता है। हमारे राजनीतिकों ने अपने गिरेबां में झांकना छोड़ दिया है। इसीलिए उन्हें दूसरों में तो खोट ही खोट नजर आते हैं, अपने में और अपनों में कोई खोट नहीं दिखता। लिहाजा, यह हैरत की बात नहीं कि चुनाव-प्रचार निंदा अभियान और घृणा अभियान में बदल जाते हैं।
कुछ दिन पहले पंजाब विधानसभा के चुनाव में भाषा की मर्यादा तार-तार हो गई थी, अब वही उत्तर प्रदेश में हो रहा है। ‘आक्रमण ही बचाव है’ की तर्ज पर कोई पीछे नहीं रहना चाहता। आपत्तिजनक बयान देने में औरों की तो छोड़िए, खुद मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री ने कोई संकोच नहीं दिखाया। पर यह जुबान फिसलना भर नहीं है। गौर करें तो ऐसे बयानों के पीछे छिपी मंशा पकड़ी जा सकती है। अक्सर जाति और धर्म के नाम पर गोलबंदी करना मकसद होता है ताकि आसानी से वोट बटोरे जा सकें। न तो आदर्श चुनावी आचार संहिता की परवाह की जा रही है न सर्वोच्च न्यायालय के हाल में दिए फैसले की। आरोप-प्रत्यारोप के पीछे सुर्खियों में बने रहने का इरादा भी काम कर रहा होता है। सनसनी की तलाश में मीडिया भी ऐसे बयानों को ज्यादा कवरेज देता है। कुल मिलाकर नतीजा यह होता है कि चुनाव प्रचार का स्तर गिरता जाता है, ओछी बातें चर्चा का विषय बन जाती हैं और असल मुद््दे किनारे हो जाते हैं। जाहिर है, इससे नुकसान हमारे लोकतंत्र को और खासकर कमजोर तबकों को होता है, जिनके पास वोट ही सबसे बड़ी ताकत है। चुनाव प्रचार के घृणा अभियान बनते जाने में सोशल मीडिया के मंचों का भी खूब इस्तेमाल हो रहा है।
राजनीति में अच्छे और बुरे सब तरह के लोग होते हैं। सवाल है कि बुरे पहलू तो दिख रहे हैं, अच्छे पहलू कहां हैं? हमारे लोकतंत्र का महापर्व जनता की समस्याओं और जन सरोकारों को लेकर जीवंत बहस का अवसर क्यों नहीं बन पा रहा है? सार्वजनिक जीवन मर्यादा तथा लोक-लाज से चलता है। पर इस तकाजे का अहसास बहुत क्षीण हो गया है। जहां कुएं में ही भांग पड़ी हो और इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता भी शामिल हों, तो निर्वाचन आयोग को कैसी सांसत महसूस होती होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। अगर शीर्ष नेताओं के बोल बिगड़े होंगे, तो उन्हें अपना नायक मानने वाले और उनके पीछे चलने वाले कार्यकर्ताओं का राजनीतिक प्रशिक्षण कैसा होगा? कहने को भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। पर यह तथ्य भारत की विशाल आबादी की तरफ संकेत करता है, या हमारी लोकतांत्रिक चेतना के विकास की तरफ?
