भाषा के आधार पर एक बार फिर अलग गोरखालैंड की मांग ने सिर उठाया है। इस बार आंदोलन के हिंसक रुख अख्तियार कर लेने से तीन आंदोलनकारी मारे गए और कई घायल हो गए। अब गोरखा जन मुक्तिमोर्चा ने इस आंदोलन को बेमियादी घोषित कर दिया है। उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस आंदोलन के पीछे साजिश देख रही हैं। छह साल पहले भी इसी तरह आंदोलन के हिंसक रुख ले लेने के बाद पुलिस की गोली से तीन आंदोलनकारी मारे गए थे। हालांकि अदालत इस आंदोलन को गैरकानूनी करार दे चुकी है, पर गोरखा जन मुक्तिमोर्चा के नेता अपनी मांग पर अड़े हुए हैं। जाहिर है कि इस आंदोलन का कोई व्यावहारिक नतीजा नहीं निकलने वाला। अलबत्ता इसके चलते वहां का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है और पर्यटकों के आने के इस मौसम में स्थानीय लोगों के रोजी-रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका पैदा हो गई है।

अलग गोरखालैंड बनाने की मांग अस्सी के दशक में उठी थी। तब सुभाष घीसिंग ने गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट गठित कर इस आंदोलन की शुरुआत की थी। तर्क दिया गया था कि जब भाषा के आधार पर सभी राज्यों का गठन हुआ है, तो गोरखालैंड को क्यों पश्चिम बंगाल की सीमा में रखा जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग वाले इलाके के लोग नेपाली बोलते हैं। इसलिए उनकी लंबे समय से शिकायत रही है कि बंगाल सरकार उनके साथ भाषा के आधार पर भेदभाव करती रही है। तब पश्चिम बंगाल सरकार ने गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के साथ समझौता किया और दार्जिलिंग गोरखा हिल्स काउंसिल बनाने पर सहमति बनी। फिर करीब बीस सालों तक इस पहाड़ी जिले में शांति रही। मगर बिमल गुरुंग ने गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट से अलग होकर गोरखा जन मुक्तिमोर्चा का गठन किया और नए सिरे से अलग गोरखालैंड की मांग उठा दी। जब उत्तराखंड, झारखंड और तेलंगाना का गठन हुआ तो इस मांग को और बल मिला। हालांकि इन तीन राज्यों का गठन विकास के तर्क पर हुआ था। इसलिए भी भाषा के आधार पर अलग गोरखालैंड की मांग को बल नहीं मिल पा रहा।

यह सही है कि विकास में गति लाने, सभी क्षेत्रों तक कानून-व्यवस्था सुचारु बनाने और लोगों की विकास में सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए राज्यों का आकार छोटा रखा जाना चाहिए। इस आधार पर कुछ नए राज्य बने भी। मगर अब भी कई राज्यों का आकार बड़ा है। मगर अलग गोरखालैंड की मांग का आधार विकास न होकर भाषा होने की वजह से यह महज राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा पोषित करने का आधार बन कर रह गया है। गोरखा जन मुक्तिमोर्चा को अपने आंदोलन को धार देने का मौका इस समय इसलिए भी मिल गया है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने आदेश पारित किया है कि राज्य के सभी स्कूलों में अनिवार्य रूप से बांग्ला भाषा पढ़ाई जाए। गोरखा जन मुक्तिमोर्चा का तर्क है कि राज्य सरकार इस तरह उनके ऊपर बांग्ला भाषा थोपना चाहती है। जबकि हकीकत यह है कि सरकारी नौकरियों के लिहाज से इस भाषा की पढ़ाई-लिखाई अहम है। अब भाषा के आधार पर राज्यों के गठन की मांग में दम नहीं रह गया है। पहले इस आधार पर हुए राज्यों के गठन पर ही सवाल उठते रहे हैं। इसलिए गोरखा जन मुक्तिमोर्चा के नेताओं को अपने क्षेत्र के विकास और लोगों के हित को ध्यान में रख कर आंदोलन की दिशा पर विचार करना चाहिए।