यूरोपीय संघ के भविष्य को लेकर जो लोग कुछ दिनों से चिंता में रहे हैं उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति पद के लिए हुए पहले दौर के चुनाव के नतीजे आने के बाद राहत की सांस ली होगी। पहले दौर के मुकाबले में सबसे ज्यादा वोट यूरोपीय संघ की तरफदारी करने वाले इमैन्यूएल मैक्रोन को मिले हैं। नेशनल फ्रंट की उम्मीदवार मारीन ल पेन दूसरे स्थान पर आई हैं, जिन्होंने भूमंडलीकरण तथा यूरोपीय संघ के विरोध को अपना खास मुद््दा बना रखा है। इमैन्यूएल मैक्रोन को 23.75 फीसद वोट मिले और मारीन ल पेन को 21.53 फीसद। फ्रांस के राष्ट्रपति पद की चुनाव प्रणाली ऐसी है कि विजयी घोषित किए जाने के लिए पचास फीसद से अधिक मत पाना जरूरी है। इसलिए चुनाव का एक और दौर होगा। जाहिर है, सात मई को होने वाले अगले दौर के मुकाबले में सिर्फ दो उम्मीदवार होंगे, मैक्रोन और ली पेन।
मैक्रोन के जीतने की प्रबल संभावना जताई जा रही है, तो इसकी वजहें साफ हैं। एक तो पहले दौर में ही वे दो फीसद से कुछ ज्यादाकी बढ़त बना कर अपनी अधिक स्वीकार्यता का संकेत दे चुके हैं। पर उससे भी बड़ी वजह यह है कि दूसरे दौर में प्रवेश करने से रह गए उम्मीदवारों में से अधिकतर ने मैक्रोव को जिताने की अपील की है। यानी दशकों से जमी-जमाई पार्टियों के समर्थन-आधार का लाभ मैक्रोव को मिल सकता है। इसलिए स्वाभाविक ही यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अंतिम दौर में वे न सिर्फ आसानी से जीत जाएंगे, बल्कि उनके और ल पेन के बीच मत-प्रतिशत का अंतराल काफी होगा। यह चुनाव कुछ मायनों में ऐतिहासिक है और कुछ मायनों में पहले के चुनावों जैसा। जब भी फ्रांस में किसी धुर दक्षिणपंथी के राष्ट्रपति बनने के आसार दिखते हैं, सब तरह के उदारवादी और समाजवादी सोच वाले लोग एक हो जाते हैं। ल पेन के खिलाफ जैसी एकजुटता बनती दिख रही है वैसा ही 2002 में हुआ था, जब उनके पिता ज्यां मैरी ल पेन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे और पहले दौर में उन्हें मिली कामयाबी ने सारे लेफ्ट-लिबरल खेमे को स्तब्ध कर दिया था। मारीन ल पेन को भी वहां की अधिकतर पार्टियां फ्रांसीसी मूल्यों के लिए खतरा मानती हैं। पर पहले दौर का परिणाम परंपरागत दलों के प्रति मोहभंग की ओर साफ इशारा करता है।
यह पहली बार है जब अंतिम मुकाबले में न कंजर्वेटिव प्रत्याशी होगा न कोई वामपंथी या समाजवादी प्रत्याशी। फ्रांस्वा ओलांद की सरकार में मैक्रोन वित्तमंत्री थे। पर साल भर पहले उन्होंने इस्तीफा देकर अपनी अलग पार्टी (एन मार्श) बना ली और सबको हैरानी में डालते हुए राष्ट्रपति पद के सबसे प्रबल दावेदार बन गए। दूसरी ओर, ल पेन ने नेशनल फ्रंट को हाशिये से मुख्यधारा में ला दिया। फ्रांस में बेरोजगारी दस फीसद से अधिक हो चुकी है। इसलिए जहां एक तरफ अर्थव्यवस्था में सुधार का सपना दिखाने वाले मैक्रोन की अपील रंग लाई वहीं ल पेन की आप्रवासी-विरोधी नीति का भी असर दिखा। परंपरागत दलों का खारिज होना इस चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता है। अगर दूसरे दौर में भी मैक्रोव जीते तो वे फ्रांस के अब तक के सबसे युवा राष्ट्रपति होंगे, अगर कहीं ली पेन जीतीं, तो पहली बार एक महिला राष्ट्रपति होगी। अलबत्ता मैक्रोव के जीतने के आसार ज्यादा दिख रहे हैं।
