अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप औपचारिक रूप से कायर्भार संभालने से पहले ही अपने बयानों के चलते विवादों में घिरते जा रहे हैं। पहले ही वे ताइवान की राष्ट्रपति से फोन पर बात करके चीन को नाराज कर चुके हैं। अब एक बार फिर उन्होंने रूस से नजदीकी बढ़ाने और वन चाइना नीति को बदलने का संकेत देकर चीन की तल्खी बढ़ा दी है। वन चाइना नीति के तहत अमेरिका ताइवान को चीन का हिस्सा मानता रहा है। चीन और अमेरिका के बीच इस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद से अब तक कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति या प्रशासनिक अधिकारी ताइवान से किसी प्रकार का संबंध रखने से बचता रहा है। मगर डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के तुरंत बाद ताइवान की राष्ट्रपति से फोन पर बात की। इस पर चीन ने नाराजगी जाहिर की, तो उन्होंने कहा कि उनकी बातचीत महज जीत की बधाई स्वीकार करने तक सीमित थी। मगर उनका यह तर्क किसी के गले नहीं उतरा।
अब एक अखबार को दिए साक्षात्कार में ट्रंप ने साफ कहा है कि उन्होंने चुनाव के दौरान जो वादे किए थे, वे महज चुनावी जुमले नहीं थे। वे उन पर अमल करेंगे। उन्होंने कहा है कि अगर चीन अपनी मुद्रा और व्यापार नीतियों में बदलाव नहीं करता है, तो वे वन चाइना नीति को मानने को बाध्य नहीं होंगे। यही नहीं, उन्होंने दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक निर्माण पर रोक लगाने की सख्त हिदायत भी दे डाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका दक्षिण चीन सागर में दखल देने की कोशिश करेगा तो दोनों देशों के बीच बड़ा युद्ध हो सकता है। इसी तरह उन्होंने रूस से नजदीकी बढ़ाने का संकेत दिया है। ट्रंप का कहना है कि अगर रूस इस्लामी चरमपंथ और ईरान पर नकेल कसने में अमेरिका का साथ देता है तो वे उसकी यूरोप में चल रही कुछ गतिविधियों की तरफ से आंखें मूंद सकता है। हालांकि अमेरिकी चुनाव के दौरान रूस के साइबर दखल के आरोप में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जाते-जाते रूस पर नकेल कसने की कोशिश की थी। उन्होंने उस पर कुछ कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। मगर ट्रंप उसे नजरअंदाज करने का मन बना चुके हैं। इससे स्वाभाविक ही इन देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों में बदलाव की संभावना देखी जा रही है।
चीन के बढ़ते व्यापारिक और आर्थिक प्रभाव के चलते अमेरिका की चिंता समझी जा सकती है। इसलिए चुनाव के दौरान जब ट्रंप ने चीन की व्यापार और मौद्रिक नीति पर अंकुश लगाने का वादा किया तो वहां के बहुत से लोगों को उनका बयान भाया था। मगर चीन के साथ संबंधों में कटुता पैदा करके ट्रंप कहां तक अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में कामयाबी हासिल कर पाएंगे, कहना मुश्किल है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि अभी ट्रंप को प्रशासनिक अनुभव नहीं है, इसलिए वे सिर्फ भावनाओं में बह कर अव्यावहारिक बातें कर रहे हैं। ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान अनेक ऐसे कड़े फैसलों का वादा किया था, जिन पर अगर वे अमल करने की कोशिश करते हैं तो दुनिया भर में हलचल पैदा हो सकती है। उन्होंने वीजा नियमों को सख्त बनाने और बाहरी लोगों के अपने यहां रोजगार आदि के मामले में कठोर कदम उठाने का संकेत दिया था, अगर वे उस पर अमल करते हैं तो बहुत सारे लोगों के लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। स्वाभाविक ही इससे ट्रंप का विरोध और बढ़ेगा।
