अमेरिका की नई वीजा नीति को लेकर दुनिया भर में बेचैनी है। सात मुसलिम देशों के नागरिकों को फिलहाल वीजा न जारी करने के ट्रंप प्रशासन के फैसले पर उठा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। भारत में भी अमेरिका की नई वीजा नीति को लेकर चिंता है। ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा देते हुए वादा किया था कि वे यह सुनिश्चित करेंगे कि अमेरिका में उपलब्ध रोजगार अमेरिकियों को ही मिले। इसी पर अमल करते हुए उन्होंने एच-1 बी वीजा को और सख्त बनाने की कवायद शुरू की है। वीजा की यह श्रेणी पेशेवरों और विशेषज्ञों को अमेरिका आने और वहां बरसों-बरस रह कर काम करने की सुविधा देती है। इससे अमेरिका को दुनिया भर की, खासकर विज्ञान व तकनीक क्षेत्र की प्रतिभाओं का लाभ मिला है, साथ ही इससे अमेरिका की यह छवि और दृढ़ हुई है कि वह एक खुला समाज है, दुनिया भर के आला दिमागों का तहेदिल से स्वागत करता है, उन्हें कैरियर बनाने और कमाई करने के बेशुमार मौके देता है। लेकिन अमेरिकी समाज के एक हिस्से को अब लगने लगा है कि यह अनावश्यक उदारता है और यह उनके देश को महंगी पड़ रही है; अमेरिका में पैदा होने वाली काफी नौकरियां बाहर के लोग पा जा रहे हैं और अमेरिकियों के बीच बेरोजगारी बढ़ रही है।
इस रोष ने कई बार नस्ली रंग भी लिया है। ट्रंप की जीत के पीछे इसी असंतोष को प्रमुख कारण माना जाता है। बहरहाल, चूंकि भारत सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में काफी आगे है और यहां के आइटी सेक्टर का काफी रोजगार प्रत्यक्ष तथा परोक्ष, दोनों तरह से अमेरिका से ताल्लुक रखता है, इसलिए एच-1 बी वीजा की शर्तों को और कठोर बनाने की कवायद से भारत में स्वाभाविक ही यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि उसके आइटी सेक्टर में काम करने वालों का क्या होगा। इस चिंता का इजहार राज्यसभा में भी हुआ। कई विपक्षी दलों ने सरकार से मांग की कि वह एच-1 बी वीजा को लेकर भारत की चिंता अमेरिका से साझा करे। मगर जिस वादे पर ट्रंप सत्ता में आए हैं और जिसे पूरा करने की खातिर वे मैक्सिको की सीमा पर दीवार खड़ी करने की हद तक आमादा हैं, उसे अपने प्रभाव से पलटने की उम्मीद भारत कैसे कर सकता है? अगर ट्रंप पीछे हटेंगे या लचीला रुख अपनाने को तैयार होंगे, तो उसी सूरत में, जब उन्हें यह अहसास होगा कि जिसे वे अनावश्यक उदारता समझते और कहते आ रहे हैं उसका भी अमेरिका को अमेरिका बनाने में अहम योगदान है और उसे तज देना अमेरिका के लिए फायदे का सौदा नहीं होगा।
मजे की बात है कि ट्रंप ने कभी यह नहीं कहा कि भारत की (या किसी और देश की) कंपनियां वापस चली जाएं। वे बस यह चाहते हैं कि नौकरी पर अमेरिकियों को रखा जाए, और एच-1 बी वीजा में नई शर्तें इसी इरादे से प्रस्तावित की गई हैं। यहां भूंडलीकरण का एक खास विरोधाभास साफ दिखता है, ट्रंप बाहर की पूंजी तो आने देना चाहते हैं, पर वहां का श्रम नहीं। ट्रंप अपनी वीजा नीति और घरेलू आर्थिक नीति में जो करें, भारत अपनी चिंता को एक दूसरा मोड़ भी दे सकता है। यहां की बहुत सारी प्रतिभाएं बेहतर कैरियर की चाह में विदेश चली जाती हैं। अमेरिका उनका पसंदीदा ठिकाना होता है। क्या हम अपने हुनरमंद तथा विज्ञान व तकनीक क्षेत्र के प्रतिभाशाली लोगों के ज्ञान व हुनर का लाभ विदेश के बजाय देश के लोगों को कैसे मिले, इसकी योजना नहीं बना सकते!
