यह सरकार और संबंधित महकमों की जिम्मेदारी होती है कि वे लोगों को गैरकानूनी आचरण करने या किसी भी स्थिति में कानून अपने हाथ में लेने से रोकें और ऐसा करने वालों को कठघरे में खड़ा करें। लेकिन मध्यप्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने जिस तरह महिलाओं को अपने शराबी पति की ‘मोगरी’ से पिटाई करने की नसीहत दी, उसे कानून-व्यवस्था को ताक पर रख देने के आह्वान के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि सरकार का हिस्सा होने के नाते कानून-व्यवस्था के सुचारु रूप से काम करने में अपनी अहम भूमिका को भूल कर वे लोगों को कानून हाथ में लेने की सलाह दे रहे हैं! अगर कोई पुरुष शराब पीकर अवांछित आचरण करता है तो क्या उसका हल यह है कि सरकार किसी को उसकी पिटाई की खुली छूट दे दे? हैरानी की बात यह है कि मंत्री गोपाल भार्गव ने महिलाओं को यह नसीहत बाकायदा एक सार्वजनिक सामूहिक विवाह समारोह में दी। साथ ही उन्होंने अपनी ओर से वहां मौजूद सात सौ नई दुल्हनों को कपड़ों को पीट कर धोने की ‘मोगरी’ भेंट में दी, ताकि वे नशे में धुत और सताने वाले पति की उससे पिटाई कर सकें। उन ‘मोगरियों’ पर संदेश लिखे थे- ‘शराबियों के सुटारा (पीटने) हेतु भेंट, पुलिस नहीं बोलेगी!’
क्या ये सरकार में एक जिम्मेदार मंत्री के पद को संभालने वाले किसी व्यक्ति के खयाल लगते हैं? क्या कानून-व्यवस्था पर इसके असर का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है? फिर अगर उनकी सलाह पर महिलाएं अमल करना शुरू करती हैं तो उसका सामाजिक प्रभाव किस रूप में सामने आएगा? अगर कोई व्यक्ति शराब पीकर हंगामा करता है, अपनी पत्नी, घर के सदस्य या किसी बाहरी व्यक्ति के भी खिलाफ हिंसा या अमर्यादित आचरण करता है तो उससे मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत निपटा जा सकता है। लेकिन ऐसी स्थिति में कानून पर अमल सुनिश्चित कराने के बजाय अगर उससे हिंसक तरीके से निपटने की सलाह दी जाती है तो उसका समर्थन किस आधार पर किया जा सकता है? इस तरह की सलाह पर अमल करने से पैदा होने वाले तनाव के हालात के अलावा भेंट में मिली ‘मोगरी’ की पिटाई से अगर किसी के बुरी तरह घायल होने या उसकी मौत जैसा हादसा हो जाता है तो वैसी स्थिति में गोपाल भार्गव आरोपी को पुलिस की कार्रवाई से किस तरह की छूट मुहैया कराएंगे? क्या उन्हें ऐसी स्थितियां बनाने के बारे में विचार करना जरूरी नहीं लगा जिसमें कोई पुरुष शराब नहीं पिए या पीकर पत्नी को यातना न दे? लेकिन शायद ही कभी एक ठोस सामाजिक विकास नीति तैयार करने का सवाल राजनीतिकों के लिए मुद्दा बना हो।
महिलाओं के उत्पीड़न या उनके खिलाफ हिंसा से निपटने के लिए घरेलू हिंसा विरोधी कानून से लेकर कई कानून हैं। मगर इनका सहारा लेने के लिए महिलाओं को जागरूक बनाने और उनके सशक्तीकरण के लिए उचित सलाह देना मंत्री महोदय को जरूरी नहीं लगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि पुरुषों का शराब पीकर बेलगाम हो जाना आज आम महिलाओं के सहज जीवन के सामने एक बड़ी समस्या रूप में सामने है। इस पर काबू पाने के लिए सरकार के स्तर पर कदम उठाए जाने चाहिए। पिछले साल बिहार सरकार ने शराब पर सख्त पाबंदी लगा कर और उस पर ठोस तरीके से अमल करके महिलाओं का महत्त्वपूर्ण समर्थन हासिल किया। लेकिन शराब पर नियंत्रण के बजाय नशे में किसी के बेलगाम बर्ताव को हिंसक तरीके से रोकने की औपचारिक सलाह कानून-व्यवस्था के सामने किस तरह की चुनौती पैदा करेगी और क्या सामाजिक नतीजे देगी, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है।
