एक तरफ सरकार यह दोहराते नहीं थकती कि नोटबंदी काले धन के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम है, और दूसरी ओर उसकी कई घोषणाएं यह सवाल पैदा करती हैं कि वह काले धन के प्रति सख्ती बरत रही है, या नरमी? मसलन, शनिवार से एक योजना शुरू हुई जिसके तहत अपने काले धन का खुलासा करके, उस पर पचास फीसद टैक्स चुका कर बाकी पचास फीसद को सफेद यानी वैध किया जा सकता है। काले धन के खिलाफ अपूर्व अभियान छेड़ने का दम भरने वाली सरकार का यह निर्णय विचित्र ही कहा जाएगा। इस तरह की माफी तो पहले भी हुई है, फिर तब और अब के रुख में क्या फर्क है? अगर अंत में माफी योजना ही लानी थी, तो करोड़ों लोगों को रोज-रोज घंटों कतार में खड़े रहने के लिए विवश क्यों किया गया? चालू वित्तवर्ष के अंत तक, पचास फीसद सरकार को देकर पचास फीसद काला धन सफेद करने का मौका देने से उन लोगों पर क्या गुजरेगी, जो ईमानदारी से सारे टैक्स भरते रहे हैं? इस फैसले के जरिए सरकार ने कैसा संदेश देना चाहा है? उसका मकसद बस किसी तरह राजस्व बढ़ाना है, या भ्रष्टाचार और बेईमानी खत्म करना?
यह भी गौरतलब है कि ऐसे लोगों से काली कमाई का स्रोत नहीं पूछा जाएगा। जबकि काला धन केवल टैक्स-चोरी की देन नहीं होता- रिश्वतखोरी, रंगदारी और अन्य बहुत-से संगीन अपराधों का भी कारण और स्रोत, दोनों होता है। सरकार ने आपराधिक पहलू की अनदेखी क्यों की? खुद काले धन का खुलासा करने वालों को जो पचास फीसद सफेद करके मिलेगा, उसका आधा यानी पच्चीस फीसद उन्हें फौरन दे दिया जाएगा और पच्चीस फीसद चार साल बाद मिलेगा। जो पच्चीस फीसद राशि चार साल तक जमा रहेगी, उससे प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना चलेगी! इस पच्चीस फीसद के महज ब्याज से, क्योंकि मूल रकम तो लौटानी रहेगी। अगर सरकार को गरीबों की बहुत फिक्र है, तो काले धन के खुलासे से मिलने वाली पूरी पचास फीसद रकम क्यों नहीं प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के लिए तजवीज की गई? सरकार की एक और घोषणा विवाद का विषय बनी, हालांकि बाद में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सफाई देकर विवाद को रफा-दफा करने की कोशिश की। पहले वित्त सचिव और फिर राजस्व सचिव के बयानों में ऐसा कहा गया था कि नोटबंदी के बाद राजनीतिक दलों के खातों में जमा की गई रकम की न तो जांच की जाएगी, न उन्हें उस रकम पर आय कर देना होगा। इससे ऐसा लगा कि उन्हें कुछ छिपाने की सहूलियत दी जा रही है।
जाहिर है, इस पर विवाद उठना ही था। बाद में जेटली ने सफाई दी कि ऐसी कोई ‘सुविधा’ नहीं दी गई है। पार्टियां आय कर अधिनियम, 1961 की धारा 13-ए से बंधी हैं, जिसके तहत उन्हें रिटर्न भी भरना होता है और अपने हिसाब-किताब का आॅडिट भी कराना होता है। अपने आय-व्यय का ब्योरा उन्हें निर्वाचन आयोग को भी सौंपना होता है। लेकिन बीस हजार रुपए से कम के चंदे का न तो उन्हें स्रोत बताना पड़ता है न उस पर टैक्स लगता है। इसका फायदा उठा कर पार्टियां अपनी अधिकांश आय को बीस हजार से कम के टुकड़ों में बांट कर पेश करती हैं। इसलिए वित्तमंत्री का स्पष्टीकरण एक पुरानी स्थिति को दोहराने से ज्यादा कुछ नहीं है। अच्छा तो यह होगा कि सरकार पार्टियों की फंडिंग को आरटीआइ के दायरे में लाने की पहल करे।

