दुनिया भर में अमेरिका की छवि दो तरह की रही है। एक, विश्व में दबदबा रखने वाले सबसे ताकतवर देश के रूप में। दूसरे, लोकतंत्र के हिमायती, खुलेपन और आधुनिकता के सिरमौर के रूप में। लेकिन अमेरिका का जो उजला पक्ष है वह अब खतरे में नजर आ रहा है। बराक ओबामा को राष्ट्रपति के तौर पर लगातार दो कार्यकाल देकर अमेरिकी जनता ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी खाई पाटी थी- श्वेत और अश्वेत के बीच की खाई। पर यह खाई फिर से खोदी और चौड़ी की जा रही है। इसलिए पिछले हफ्ते हुई भारतीय मूल के श्रीनिवास कुचिभोटला की हत्या को एक अलग-थलग घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह पहली नजर में ही हेट क्राइम यानी घृणा-अपराध का मामला लगता है। अमेरिका किधर जा रहा है? श्रीनिवास पेशे से इंजीनियर थे और अपने एक दोस्त आलोक मदसानी के साथ, काम के बाद, बार में बैठे थे। वहां एक अमेरिकी ने, जो कि नौसेना से सेवानिवृत्त हो चुका है, दोनों पर गोली चला दी। आलोक की जान तो बच गई, मगर श्रीनिवास की मौत हो गई। हमले से पहले, आरोपी से दोनों की संभवत: नस्ली मसले पर बहस हुई थी। उस वक्त आरोपी बाहर चला गया, मगर कुछ देर बाद बंदूक लेकर लौटा और उसने दुनिया भर को दहलाने वाले कांड को अंजाम दे दिया। गोली चलाते समय वह ‘मेरे देश से भाग जाओ’ और ‘आतंकवादी… आतंकवादी’ चिल्ला रहा था।

कोई भी आदमी जो बहस के बाद जान लेने पर उतारू हो जाए, स्वस्थ मन का नहीं कहा जा सकता। मगर क्या इस घटना को सिर्फ एक सिरफिरे का पागलपन कह कर उससे आंख चुराई जा सकती है? दरअसल, यह वाकया उस माहौल की एक खौफनाक झलक है जो अमेरिका की कमान डोनाल्ड ट्रंप के हाथ में आने से बनी है। यों नस्ली हिंसा की घटनाएं ट्रंप से पहले भी हुई हैं, पर उन्हें अमेरिका की रीति-नीति से जोड़ कर नहीं देखा गया। कनसास की घटना इसी मायने में अलग है कि इसे ट्रंप के रवैए से जोड़ कर देखा जा रहा है। विचित्र यह है कि आप्रवासियों के खिलाफ नफरत का माहौल अमेरिका को फिर से महान बनाने के नाम पर बनाया जा रहा है। अगर लगातार जहरीला प्रचार हो तो वह प्रचार तक सीमित नहीं रहता, उसके असर में आए कुछ लोग इतने उन्मत्त हो जा सकते हैं कि कुछ भी कर बैठें।

अमेरिका में ट्रंप के आने के बाद नस्ली हिंसा में 115 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। अपने चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने आप्रवासियों के खिलाफ जो जहर उगला, उससे और कैसा माहौल बनता? यह घटना भारत के लिए भी एक सबक है, जहां चुनाव के दौरान किसी किस्म के ध्रुवीकरण के लिए नफरत-भरे अभियान चलाए जाते हैं। अलबत्ता कनसास की घटना से यह नहीं मान लेना चाहिए कि अमेरिका एकदम-से बदल गया है। ट्रंप के खिलाफ लाखों लोग सड़कों पर उतर चुके हैं। कनसास की घटना में, एक अमेरिकी युवक इयान ग्रिलोट ने खुद गोली खाकर भी श्रीनिवास और आलोक की जान बचाने की कोशिश की। श्रीनिवास के परिवार की आर्थिक मदद के लिए इंटरनेट पर जो अपील जारी की गई, उसके फलस्वरूप कुछ ही घंटों में लक्ष्य से ज्यादा राशि इकट्ठा हो गई। यह सब बताता है कि आप्रवासियों को निशाना बनाए जाने के खिलाफ खुद अमेरिका के भीतर कितना विरोध है।