अन्नाद्रमुक के विधायक दल की नेता चुने जाने के साथ ही वीके शशिकला के तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया। इसी के साथ मुख्यमंत्री पद से ओ पन्नीरसेलवम ने इस्तीफा दे दिया, जो जयललिता के निधन के बाद से सरकार की कमान संभाले हुए थे। अपने इस्तीफे के पीछे पन्नीरसेलवम ने ‘कुछ निजी कारण’ बताया है, पर असल वजह राजनीतिक है जिसकी जड़ व्यक्ति-पूजा की अन्नाद्रमुक की संस्कृति में है। जयललिता के निधन के पखवाड़े भर बाद ही अन्नाद्रमुक ने शशिकला को अपना महासचिव चुन लिया था, जो पार्टी का सर्वोच्च पद है। और अब उसके डेढ़ महीने बाद पार्टी ने सरकार की कमान भी शशिकला को सौंप दी है। बस मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की औपचारिकता बाकी है। इस तरह सत्ता के दो केंद्र बनने की आशंका से पार्टी ने छुटकारा पा लिया है और अपने को पूरी तरह शशिकला की शख्सियत पर आश्रित कर लिया है, इस उम्मीद में कि वे जयललिता की कमी यानी करिश्माई नेतृत्व की जरूरत पूरी कर सकेंगी। ऐसा हो पाएगा या नहीं, यह तो भविष्य बताएगा, पर शशिकला के चुनाव पर कई सवाल उठते हैं।
आखिर पार्टी ने उन्हीं को क्यों चुना? पार्टी कह सकती है, और कहा भी है कि यह उसका आंतरिक मामला है। पर क्या यह तर्क पर्याप्त या जायज है? फिर अब बात सिर्फ पार्टी-नेतृत्व की नहीं, सरकार के नेतृत्व की भी है, जिसका वास्ता राज्य की समूची जनता से है। पन्नीरसेलवम को जयललिता ने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी, जब उन्हें आय से अधिक संपत्ति के मामले की वजह से हटना पड़ा तब भी और जब उन्हें गंभीर बीमारी की हालत में अस्पताल में भर्ती होना पड़ा तब भी। बेशक हर बार पन्नीरसेलवम को ही जिम्मेदारी सौंपने के पीछे सबसे बड़ी वजह उनकी वफादारी थी। शशिकला भी जयललिता से जान-पहचान होने के बाद से हमेशा उनके करीब रहीं, संकट के समय साथ दिया। पर जयललिता ने उन्हें न कभी पार्टी में कोई जिम्मेदारी सौंपी न चुनाव में उम्मीदवार बनाया। औपचारिक रूप से राजनीतिक जिम्मेदारी का उनका अनुभव बस दो माह का है। सरकार या प्रशासन का तो तनिक अनुभव नहीं। परदे के पीछे रह कर वे भले सत्ता-सुख और रणनीतिक प्रबंधन में शामिल रही हों। सवाल यह है कि क्या वे दूसरी जयललिता साबित हो पाएंगी, जिसकी आस में पार्टी ने उन्हें सर्वसम्मति से पहले महासचिव पद सौंपा और अब विधायक दल की नेता भी चुन लिया? इस सवाल का आत्मविश्वास के साथ जवाब शायद पार्टी भी फिलहाल न दे पाए। पर ऐसा लगता है कि व्यक्ति-पूजा पर चलने की आदी रही अन्नाद्रमुक ने अपने को टूटन और बिखराव से बचाने की कवायद की है।
तमिलनाडु के विपक्षी दलों ने शशिकला की शरण में जाने पर अन्नाद्रमुक की आलोचना की है। उनकी दलीलों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। पर सवाल यह है कि क्या अन्य तथा अधिक अहम कसौटियों के बदले वफादारी को ही महत्त्व देने की कमजोरी से दूसरी पार्टियां बची हुई हैं? क्या खुशामद तथा व्यक्ति-पूजा की संस्कृति केवल अन्नाद्रमुक की कमजोरी है, या और भी पार्टियां इसकी शिकार हैं? कितनी पार्टियां यह दावा कर सकने की स्थिति में हैं, कि वे सुप्रीमो तथा हाइकमान की मर्जी से संचालित नहीं होतीं और उनके यहां आंतरिक लोकतंत्र है? शशिकला को अन्नाद्रमुक का महासचिव और अब पार्टी के विधायक दल की नेता चुना जाना परोक्ष रूप से परिवारवाद ही है, क्योंकि उनकी ताजपोशी के पीछे जयललिता की सहेली होने की छवि की अहम भूमिका रही। पर परिवारवाद का रोग क्या अन्नाद्रमुक तक सीमित है?
