केरल के सबरीमाला मंदिर में हुई भगदड़ में करीब चालीस लोग घायल हो गए, जिनमें से तीन की हालत गंभीर है। एक बार फिर यह जाहिर हुआ है कि भारत में भीड़ प्रबंधन के उत्तरदायी लोगों ने पुरानी घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा है। इसी मंदिर में 2011 के मकरज्योति आयोजन में भगदड़ से एक सौ चार श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। केरल में ही इस साल अप्रैल में पुत्तिंगल मंदिर में भगदड़ मचने से कुचल कर सौ से अधिक लोग मारे गए थे। भारत में सार्वजनिक विशेषकर धार्मिक आयोजनों में हर साल ऐसी कई घटनाएं होती हैं और कुछ न कुछ लोग मारे जाते हैं। फिर भी न तो सरकारें भीड़ प्रबंधन को लेकर मुस्तैद नजर आती हैं न ही आयोजक संस्थाएं। अभी लोग बीते अक्तूबर में वाराणसी में जयगुरुदेव के अनुयायियों की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में पंद्रह पच्चीस से ज्यादा लोगों की मौत को भूले नहीं हैं। दुर्घटनाओं, भगदड़ों और मौतों का एक लंबा सिलसिला है, जो दिल दहलाने वाला है। मरने वालों में अक्सर बच्चों और महिलाओं की तादाद ज्यादा होती है।

एक अध्ययन के अनुसार में भारत में सन 2000 से अब तक करीब सवा चार हजार लोग भगदड़ में मारे गए हैं। ‘इंटरनेशनल जर्नल आॅफ डिजास्टर रिस्क रिडक्शन’ के मुताबिक भारत में 79 फीसद दुर्घटनाएं धार्मिक आयोजनों में होती हैं, और ज्यादातर अफवाहों की वजह से। राजनीतिक रैलियों में भी लोग बम विस्फोटों और भगदड़ आदि में मारे गए हैं। सरकारी जिम्मेदारी का आलम यह है कि 1999 में पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय ने एक समिति का गठन कर देश भर के धार्मिक स्थलों के मद््देनजर साल भर के भीतर एक रिपोर्ट देने को कहा था। उस समिति और उस रिपोर्ट का अता-पता नहीं चला। जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं तो संबंधित राज्य सरकार किसी छोटे-मोटे अधिकारी को निलंबित कर देती है। जांच बिठा दी जाती है। धीरे-धीरे मामला खत्म हो जाता है। लेकिन हादसे जारी रहते हैं। ऐसी दुर्घटनाओं में ज्यादा लोगों के मरने का एक बड़ा कारण कारगर आपदा प्रबंधन का न होना भी है।

धार्मिक आयोजन हो या कोई और, कहने के लिए प्रशासन को आने वालों की तादाद की मोटा-मोटी जानकारी दी जाती है या प्रशासन परंपरागत धार्मिक पर्वों, उत्सवों या स्नानों आदि पर खुद ही एक अनुमानित आंकड़ा रखता है। इसके बावजूद दुर्घटनाएं होती हैं, क्योंकि भीड़ को नियंत्रित करने का कोई कारगर उपाय प्रशासनिक अमले के पास प्राय: नहीं होता। किसी धार्मिक अयोजन पर रोक लगाना संभव नहीं है, लेकिन इतना तो किया ही जा सकता है कि एक वक्त पर एक ही जगह निर्धारित सीमा से ज्यादा लोग एकत्र न हो सकें। प्रवेश और निकास के रास्ते अलग-अलग हों। पर्याप्त प्रकाश का प्रबंध हो। ऐसी जगहों पर पेयजल, दवाई और आपातचिकित्सा आदि की व्यवस्था भी जरूर होनी चाहिए। अनहोनी की सूरत में लोग घायल पड़े चीखते-चिल्लाते रहते हैं। लेकिन कोई उन्हें देखने-सुनने वाला नहीं होता। यह जरूरी है कि भीड़ पर पैनी निगरानी हो, अफवाहों की काट व उपयोगी सूचनाओं के प्रसार की मुकम्मल व्यवस्था हो और राहत-बचाव आदि की युद्धस्तर पर पूर्व-तैयारी रखी जाए। और इस सब की जवाबदेही प्रशासन के साथ-साथ आयोजकों की भी हो।