हालांकि कश्मीर घाटी में हिंसा का दौर पिछले साल जुलाई से, यानी हिज्बुल के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से, थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ बना रहा है। पर इन दिनों वहां कानून-व्यवस्था की हालत जितनी खराब है उतनी हाल के इतिहास में शायद ही कभी रही हो। इस स्थिति की बाबत पीडीपी-भाजपा की सरकार अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकती। जब पीडीपी और भाजपा का गठबंधन हुआ तो उसे बहुत-से लोगों ने दो बेमेल पार्टियों का मिलन कहा था। पर ऐसे भी लोगों की कमी नहीं थी जो इस विरोधाभासी गठबंधन में नई आशा, नई शुरुआत की संभावना देखते थे। उन्हें लगता था कि यह गठबंधन जम्मू और घाटी के बीच की मनोवैज्ञानिक खाई को पाटने का काम करेगा और साथ ही सांप्रदायिक सौहार्द का संदेशवाहक साबित होगा। पर वह उम्मीद धूमिल हो गई जान पड़ती है। जम्मू के लोगों ने भाजपा पर भरोसा जताया था तो घाटी के लोगों ने पीडीपी पर। दोनों पार्टियों का गठबंधन तो हुआ, पर इससे जिस नई शुरुआत की आस जोड़ी गई थी उसकी चिंदियां बिखर गई हैं।
दोनों पार्टियों ने जो ‘गठबंधन का एजेंडा’ जारी किया था उसमें राज्य के सभी समूहों से संवाद करने, उनका भरोसा जीतने और टिकाऊ शांति के लिए हरसंभव प्रयास करने की बात कही गई थी। पर ‘एजेंडे’ की दिशा में कुछ करना तो दूर, राज्य सरकार कानून-व्यवस्था बहाल रखने में भी अक्षम साबित हो रही है। हालात बेहद त्रासद हैं। सोमवार को पूरी घाटी में छात्र-छात्राएं सड़कों पर उतर आए, दो दिन पहले पुलवामा में विद्यार्थियों पर की गई कथित दमनात्मक कार्रवाई पर विरोध जताने के लिए। और कोई साठ विद्यार्थी पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों से हुए टकराव में घायल हो गए। सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंके जाने तथा सुरक्षा बलों के बल प्रयोग का दायरा कुछ दिनों में बढ़ता ही गया है। इस बीच सामने आए कुछ वीडियो ने भी तनाव बढ़ाया है। हालात को बेकाबू होते देख पुलिस को दूरसंचार कंपनियों से घाटी में थ्री जी और फोर जी इंटरनेट सेवा फिलहाल स्थगित रखने को कहना पड़ा। इस सारे परिदृश्य में एक तरफ सुरक्षा बल हैं और दूसरी तरफ घाटी के नाराज युवा। एक तरफ बल प्रयोग की मशीनरी है और दूसरी तरफ व्यवस्था से मोहभंग। हो सकता है सीधे-सादे लोगों को बहकाने या भड़काने वाले शरारती तत्त्व तथा षड्यंत्रकारी भी सक्रिय हों। पर सवाल है कि वह राजनीतिक नेतृत्व कहां है जो उबाल को शांत कर शांति का रास्ता निकाल सके?
कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री घाटी के दौरे पर गए थे और उन्होंने वहां वाजपेयी के ‘इंसानियत, कश्मीरियत और जम्हूरियत’ के सूत्र को दोहराया। पर इस दिशा में कोई ठोस पहल न होने से वह एक कोरा जुमला होकर रह गया है। राजनीतिक दूरंदेशी के अभाव में हो बस यह रहा है कि संकट से जूझने के लिए सेना की तैनाती और बढ़ा दी जाती है। पर एक असामान्य स्थिति से निपटने का उपाय स्थायी नहीं हो सकता। श्रीनगर लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में सिर्फ सात प्रतिशत मतदान हुआ। यह दो बातों की तरफ इशारा करता है। एक यह कि इतना डरावना माहौल है कि लोग वोट डालने नहीं गए। दूसरे, यह कि लोगों ने मतदान का बहिष्कार कर अपने गुस्से का इजहार किया। सुरक्षा बल उपद्रव और विघ्न से निपटने की ही भूमिका निभा सकते हैं। वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनभागीदारी का जरिया नहीं बन सकते। इसलिए राजनीतिक नेतृत्व को घाटी के हालात की बाबत सुरक्षा बलों की भूमिका से आगे जाकर भी सोचना होगा।

