अमेरिका में घृणा से उपजी हिंसा लगातार बढ़ रही है। इसका शिकार कुछ भारतीय भी बन चुके हैं। पहले एक इंजीनियर की हत्या कर दी गई, फिर एक व्यवसायी को मार डाला गया और एक लड़की को गालियां दी गर्इं। वहां रह रहे लोगों को आए दिन नस्ली टिप्पणियों और अपने देश वापस लौट जाने की धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। इन घटनाओं से स्वाभाविक ही अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों और भारत सरकार की चिंता बढ़ी है। हालांकि अमेरिकी समाज और प्रशासन ऐसी घटनाओं पर हमेशा सख्त प्रतिक्रिया जताता रहा है, मगर इस दौरान हैरान करने वाली खामोशी दिखाई दे रही है। हालांकि इन घटनाओं के बाद भारतीय मूल के लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंतित भारत सरकार ने विदेश सचिव और वाणिज्य सचिव को अमेरिकी प्रशासन से बातचीत के लिए भेजा और उन्हें आश्वासन मिला है कि भारतीयों की सुरक्षा का ध्यान रखा जाएगा, मगर अभी तक राष्टÑपति कार्यालय से कोई संतोषजनक बयान नहीं आ पाया है। दरअसल, राष्टÑपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव के दौरान अमेरिकी युवाओं से जो वादे किए थे और राष्टÑपति का पदभार संभालने के साथ ही उन्होंने उन वादों पर अमल करने की पहल भी शुरू कर दी, उससे बाहरी लोगों के प्रति अमेरिकी युवाओं में नफरत उभरनी शुरू हो गई है। ट्रंप के वादों में एक यह भी था कि वे बाहरी मुल्कों से आकर अमेरिका में रोजगार करने वालों पर नकेल कसेंगे, ताकि अमेरिकी युवाओं को रोजगार मिल सके।
इसके मद्देनजर उन्होंने वीजा नियमों को सख्त किया। कुछ मुसलिम देशों के नागरिकों के अमेरिका आने पर प्रतिबंध लगाया। इससे अमेरिकी युवाओं में यह धारणा गाढ़ी हुई है कि बाहरी लोगों की वजह से उनका अधिकार बाधित हो रहा है और जितनी जल्दी वे अमेरिका से चले जाएंगे, उतनी जल्दी उनके लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। हालांकि ट्रंप प्रशासन के फैसलों के खिलाफ अमेरिका में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भी हुए, कुछ मामलों में हस्तक्षेप करते हुए अदालतों ने ट्रंप प्रशासन के विरुद्ध फैसले सुनाए, मगर राष्टÑपति के रुख में कोई नरमी नजर नहीं आई। भारतीय मूल के लोगों के खिलाफ हिंसा के मामले में भी उनकी चुप्पी इसी का नतीजा है। मगर इससे न सिर्फ अमेरिका में माहौल बिगड़ रहा है, बल्कि दुनिया भर में अमेरिका की नकारात्मक छवि बन रही है। इस तरह बाहरी लोगों को डरा-धमका या फिर उन पर हिंसक हमले और नस्ली टिप्पणियां कर उन्हें वापस लौटने को बाध्य किया जाना न तो स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है और न मानवाधिकार की दृष्टि से उचित।

