पांच राज्यों- उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर विधानसभाओं के चुनाव नतीजों से भाजपा और मजबूत हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की ताकत भी बढ़ी है। दिल्ली और बिहार विधानसभाओं में मिली शिकस्त के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल कुछ डिगा था, अब वह लौटा है। सबकी निगाहें उत्तर प्रदेश पर टिकी थीं। यहां की हार-जीत भाजपा के लिए अगले आम चुनाव की इबारत लिखने वाली मानी जा रही थी। इसलिए उसने दूसरे राज्यों की अपेक्षा अपनी पूरी ताकत यहां झोंक दी थी। चुनाव के आखिरी चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार रैलियां कीं। फिर भी माना जा रहा था कि भाजपा को समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से कड़ी टक्कर मिलेगी। मतदान बाद के सर्वेक्षणों में भी भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं दिख रहा था। मगर मशीनें खुलीं तो सारे कयासों को मटियामेट कर भाजपा ने जो कामयाबी हासिल की, उसकी उम्मीद उसे खुद नहीं थी। इस नतीजे ने जाति, समुदाय, धर्म आदि के तमाम समीकरणों पर सवालिया निशान लगाते हुए साबित किया है कि मतदाता का मन बदल रहा है।

पंजाब के नतीजे पहले से लोगों को पता थे। शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठबंधन सरकार से लोगों में नाराजगी थी। सत्ता विरोधी लहर वहां शुरू से थी। ऐसे में एक मजबूत विकल्प के तौर पर आम आदमी पार्टी को देखा जा रहा था, मगर मतदाताओं ने उसे नकार कर कांग्रेस पर भरोसा जताया। उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार से असंतोष के चलते भाजपा को लाभ मिलने की उम्मीद पहले से थी। गोवा और मणिपुर में भी कांग्रेस और भाजपा के बीच टक्कर रही। जबकि गोवा में भाजपा से छिटके नेता और आम आदमी पार्टी मैदान में थे। मगर मतदाताओं ने भाजपा और कांग्रेस में से किसी एक को विकल्प चुना। यानी इन नतीजों से साफ हुआ कि अब मतदाता क्षेत्रीय और छोटे दलों के बजाय बड़े दलों पर भरोसा करने लगा है। यही वजह है कि जिस कांग्रेस में लोगों को कोई दम नजर नहीं आ रहा था, उसे भी इस बार कुछ संजीवनी मिली। पंजाब में तो उसने पूर्ण बहुमत हासिल किया ही, गोवा और मणिपुर में बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। गोवा में भाजपा बेशक दूसरे दलों के साथ मिल कर सरकार बना ले, पर मणिपुर में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली विजय से कुछ बातें साफ हुई हैं। एक तो यह कि लोकसभा चुनावों के समय जो समर्थन उसे मिला, वह बरकरार है। दूसरे, नोटबंदी से लोगों में नाराजगी का कयास झूठा साबित हुआ। जातीय समीकरण भी बदला है। समाजवादी पार्टी का वोट बैंक बिखरा और यादव के अलावा अन्य ओबीसी जातियां भाजपा के समर्थन में चली गईं। इसी तरह दलित वोट बंटा और हिंदुत्व के प्रभाव में उसका कुछ हिस्सा भाजपा को मिल गया। मुसलिम वोट सपा, बसपा, कांग्रेस और निर्दलीय के बीच बंट गया। इससे भाजपा का पलड़ा भारी होता गया। इन सबके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उत्तर प्रदेश के लोगों में मोदी का प्रभाव अब भी बना हुआ है और उन्हें लगता है कि राज्य में भी भाजपा की सरकार बनने से विकास के नए रास्ते खुल सकते हैं, रोजगार के नए अवसर उपलब्ध हो सकते हैं। इसलिए खासकर उत्तर प्रदेश में लोगों की उम्मीद पर खरे उतरना प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के लिए चुनौती होगी।