वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी अधिनियम के लागू होने की राह कुछ और आसान हो गई है। जीएसटी परिषद की बैठक में राज्यों की तरफ से आई छब्बीस संशोधन मांगों को केंद्र ने स्वीकार कर लिया है। इस तरह राज्यों की तरफ से उठाई गई आपत्तियों का निराकरण हो गया है और जीएसटी का मसविदा लगभग अंतिम चरण में है। बजट पर बहस वाले सत्र में यह विधेयक संसद में रखा जाएगा और उम्मीद की जा रही है कि इसका एक हिस्सा जुलाई में लागू किया जा सकता है। इसकी सीजीएसटी, एसजीएसटी और आइजीएसटी तीन कोटियां तय की गई हैं। सीजीएसटी के तहत केंद्र सरकार को कर लगाने का अधिकार होगा और आइजीएसटी के अंतर्गत अंतरराज्यीय कारोबार को ध्यान में रख कर करों का निर्धारण होगा।

एसजीएसटी के तहत राज्य सरकारें करों का निर्धारण कर सकेंगी। दरअसल, जीएसटी के मसौदे पर राज्य सरकारों को सबसे अधिक आपत्ति इस बात को लेकर थी कि उनके कर निर्धारण का अधिकार सुरक्षित कैसे रहेगा और जीएसटी लागू होने के बाद उन्हें होने वाले राजस्व के नुकसान की भरपाई कैसे होगी। इसका निराकरण करने के मकसद से ही जीएसटी की तीन कोटियां बनाई गई हैं। राज्यों की मांग थी कि ढाबों, रेस्तरां आदि जैसे छोटे कारोबारों पर कर निर्धारण उनके अधिकार क्षेत्र में रहे। उनकी यह मांग मान ली गई है और इसका दायरा पांच फीसद तक रखा गया है। जीएसटी की दरें पांच, बारह, अठारह और अट्ठाईस फीसद रखी गई हैं। हालांकि, विपक्षी दलों का कहना रहा है कि केंद्रीय कर की दरें बीस फीसद से ऊपर नहीं रखी जानी चाहिए। जीएसटी लागू होने के बाद केंद्र और राज्यों की तरफ से लगने वाले करों की झंझट खत्म हो जाएगी और कारोबारियों को समान कर भुगतान करना पड़ेगा।

इससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें कम होने की उम्मीद की जाती है। हालांकि, शुरुआती चरण में करों की दरें ऊंची हो सकती हैं, पर जैसे-जैसे राज्यों के राजस्व नुकसान की भरपाई होती जाएगी, इसके कम होने की उम्मीद की जाती है। अगर केंद्रीय कर लागू होने के बाद भी अंतरराज्यीय कारोबार की दरें केंद्रीय कर से अलग मौजूद रहेंगी, तो व्यापारियों की करों के अतिरिक्त बोझ की शिकायत शायद ही दूर हो। इसलिए इसकी जटिलताओं को दूर करने और कर व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के उपायों पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत होगी।