हालांकि इससे पहले भी अमेरिका के सूचना-दुर्ग में सेंध लगी है, पर वे व्यक्तियों के कारनामे थे, और कई बार तो खुद अमेरिका के अपनों ने उन्हें अंजाम दिया। पर यह शायद पहली बार हुआ कि अमेरिका ने किसी देश की सरकार पर साइबर हमले का आरोप लगाया है। गौरतलब है कि पिछले हफ्ते अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने रूस के पैंतीस राजनयिकों को बहत्तर घंटों के भीतर अमेरिका छोड़ने का आदेश दिया। इसके अलावा, उन्होंने मेरीलैंड और न्यूयार्क स्थित रूसी परिसरों को भी प्रतिबंधित कर दिया, यानी इन परिसरों का इस्तेमाल अब रूसी कर्मचारी नहीं कर पाएंगे। आदेश में कहा गया है कि इन परिसरों का इस्तेमाल गुप्त कामों के लिए किया जा रहा था। ओबामा ने रूस की दो खुफिया सेवाओं एफएसबी और जीआरयू पर भी पाबंदी लगाने की घोषणा कर दी। इस कार्रवाई से रूस का पारा चढ़ना ही था। रूसी विदेश मंत्रालय ने पैंतीस अमेरिकी राजनयिकों को रूस छोड़ने का आदेश देने की सिफारिश करके जवाबी कार्रवाई की भूमिका तैयार कर दी थी, मगर राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने वैसा आदेश देने से फिलहाल इनकार कर दिया। पुतिन सख्त मिजाज के माने जाते हैं। फिर उन्होंने अप्रत्याशित नरमी क्यों दिखाई? दरअसल, उन्हें लगा होगा कि कुछ दिन इंतजार कर लेना बेहतर होगा, क्योंकि बीस जनवरी को अमेरिका की कमान डोनाल्ड ट्रम्प के हाथ में आ जाएगी, जिन्होंने रूस से संबंध सुधारने का वादा कर रखा है। पर ओबामा का ताजा फैसला ट्रम्प के लिए कड़ा इम्तहान साबित होगा।
हैकिंग के इस मामले को लेकर रूस के खिलाफ अमेरिका में व्यापक नाराजगी का भाव है, अमेरिकी प्रशासन में भी। अमेरिकी राजनीतिक वेबसाइटों और ई-मेल खातों को हैक कर अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव को प्रभावित करने की रूसी हरकतों पर अमेरिका ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों रूसी खुफिया एजेंसियां- एफएसबी और जीआरयू- अमेरिकी सरकार और अमेरिकी नागरिकों के खिलाफ साइबर गतिविधियों में लिप्त थीं। क्या ट्रम्प इस रिपोर्ट को झुठला पाएंगे, जिसे अमेरिकी अधिकारियों ने ही तैयार किया है? सवाल यह भी है कि कार्रवाई ट्रम्प पर छोड़ देने के बजाय ओबामा ने सख्ती क्यों दिखाई, जबकि उनके कार्यकाल को इक्कीस दिन ही रह गए थे। शायद रूस को कड़ा संदेश देने के साथ ही ओबामा जाते-जाते अपनी छाप और गहरी कर जाना चाहते हैं। उन्होंने ऐसे कई और कदम उठाए हैं। मसलन, विवादित क्षेत्रों में इजराइली बस्तियां बसाए जाने के मामले में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को इजराइल की निंदा के लिए हरी झंडी दे दी, जिस पर इजराइल खफा है।
डेमोक्रेटिक पार्टी के लोगों ने हाल में ‘अफोर्डेबल केयर एक्ट’, जिसे ‘ओबामा केयर’ भी कहा जाता है, के लिए पंजीकरण का अभियान छेड़ दिया, ताकि सत्ता संभालने पर ट्रम्प के लिए इस नीति को खारिज करना बहुत मुश्किल हो जाए। बहरहाल, हैकिंग का यह बहुचर्चित मामला बाकी दुनिया के लिए भी यह एक चेतावनी का विषय है। कई बार चीन पर दूसरे देशों के खिलाफ साइबर सेंधमारी के आरोप लगे हैं। अगर राज्य-प्रायोजित साइबर अपराध होंगे, तो उन्हें रोकना कैसे संभव होगा? ऐसे में तो साइबर-अपराध युद्ध के भी कारण बन सकते हैं। भारत में सरकार ने डिजिटल तरीकों से भुगतान की मुहिम छेड़ रखी है, जबकि यहां डिजिटल ढांचा अभी उतना विकसित नहीं है। ऐसे में हैकिंग के इस मामले में हमारे लिए भी सतर्कता से कदम बढ़ाने का संदेश निहित है।
