भारत के सिलिकॉन वैली के नाम से मशहूर बंगलुरुमें नए साल के जश्न के दौरान जो हुआ उससे इस शहर की छवि पर बट््टा लगा है। उपद्रवियों और हुड़दंगियों ने न सिर्फ महिलाओं के साथ छेड़खानी की, बल्कि छोटे-छोटे बच्चों के साथ भी धक्का-मुक्की की। विडंबना यह रही कि मौके पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने उनकी कोई खास मदद नहीं की। कोढ़ में खाज यह कि कर्नाटक के गृहमंत्री जी. परमेश्वर ने समूचे घटनाक्रम के लिए युवाओं और युवतियों के ‘पश्चिमी तौर-तरीकों और कपड़े पहनने के ढंग’ को जिम्मेवार ठहराया। उन्होंने कहा कि मौके पर डेढ़ हजार पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे, हम उन्हें दस हजार पुलिसकर्मी कैसे दे सकते थे? हालांकि उन्होंने इस मामले की जांच के भी आदेश दिए हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमार मंगलम ने मंत्री महोदय के बयान पर कड़ा एतराज जताया है और कहा है कि क्या भारतीय पुरुष इतने गिरे हुए हैं कि किसी समारोह में महिलाओं को पश्चिमी कपड़ों में देख बेकाबू हो जाते हैं? उन्होंने राज्य के पुलिस प्रशासन से रिपोर्ट तलब की है।

आमतौर पर बंगलुरुको शांत और महिलाओं के लिए सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इकतीस दिसंबर की रात शहर के पॉश इलाके एमजी रोड और ब्रिगेड रोड पर नए साल के स्वागत में जश्न मनाने के लिए लोग- महिलाएं, पुरुष और बच्चे- रात दस बजे से ही जुटना शुरू हो गए थे। यों तो इस मौके पर हर साल यहां जश्न मनाने लोग इकट्ठा होते रहे हैं और कोई बहुत सभ्य-शालीन माहौल पहले भी नहीं होता था, लेकिन इस बार स्थिति कुछ ज्यादा ही बिगड़ गई। इसकी एक वजह तो यह रही कि स्थानीय प्रशासन ने व्यावसायिक समूहों और रेस्तरां, बार और पब-क्लबों के दबाव में जश्न की समय-सीमा दो बजे रात तक बढ़ा दी थी। इसके अलावा, इस बार भीड़ और वाहनों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस प्रशासन ने कोई विशेष तैयारी नहीं की थी। रात गहराते ही नशे में धुत युवकों ने महिलाओं को भद््दे ढंग से छूने, दबोचने और उनके कपड़ों पर अश्लील फिकरे कसने शुरू कर दिए। इस अफरा-तफरी में कई महिलाओं को अपनी सैंडिलें हाथ में लेकर भागते और पुलिसवालों से मदद मांगते देखा गया। कुछ महिलाओं को उनके साथी पुरुषों या स्वजनों को भीड़ से निकाल कर ले जाते देखा गया। कुछ युवतियां रोते हुए भी दिखीं।

स्थानीय पुलिस प्रशासन का कहना है कि किसी ने कोई लिखित शिकायत नहीं की है, लेकिन अखबारों में छपी तस्वीरों और सीसीटीवी फुटेजों में उपद्रवियों की करतूतें दर्ज हैं। पुलिस इन्हीं सबूतों के आधार पर दोषियों की तलाश में लगी है। यों तो मौके पर करीब डेढ़ हजार सुरक्षाकर्मी तैनात थे, जिनमें बड़ी संख्या में महिला पुलिसकर्मी भी थीं। लेकिन भुक्तभोगियों का कहना है पुलिस ने कोई खास बीचबचाव नहीं किया। यह प्रशासन की चूक ही मानी जाएगी कि वह भीड़ का कोई अंदाजा नहीं लगा सका, फिरहुड़दंग के शिकार हो रहे लोगों को बचाया भी नहीं। लेकिन एक और पहलू भी गौरतलब है। खुशी के मौकों पर शराबखोरी का चलन बढ़ रहा है। पीने-पिलाने की संस्कृति को विकसित करने का जोर भी कहीं न कहीं हमारी राज्य-व्यवस्था की तरफ से है। लेकिन हमें वह प्रसिद्ध जुमला नहीं भूलना चाहिए कि आपकी स्वतंत्रता वहीं खत्म हो जाती है, जहां मेरी नाक शुरू होती है।