कांग्रेस और केंद्र सरकार के बीच अमेठी में मेगा फूड पार्क को लेकर चल रहे आरोप-प्रत्यारोप में इस योजना की व्यावहारिकता का सवाल दब गया है। करीब छह साल पहले यूपीए सरकार के दौरान खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय ने फूड पार्क स्थापित करने की योजना बनाई थी। यह योजना इस मकसद से शुरू की गई कि खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा मिले और संबंधित सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध हों। मोटा अनुमान यह है कि हमारे देश में सब्जियों और फलों की बीस फीसद या इससे भी अधिक मात्रा नष्ट हो जाती है। फूड पार्क की योजना यह सोच कर बनाई गई कि खाद्य सामग्री की बरबादी रोकी जा सकेगी। साथ ही रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। किसानों को उपज का बेहतर मूल्य दिलाने में मदद मिलेगी। जाहिर है, इस योजना में निहित उद्देश्य पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। लेकिन इसकी व्यावहारिक कठिनाइयां दिन पर दिन उजागर होती गई हैं। पर इस बारे में चर्चा नहीं हो रही है। बस अमेठी का मामला हावी हो गया है, क्योंकि यह राहुल गांधी का निर्वाचन क्षेत्र है और वे वहां से सांसद हैं।

पिछली सरकार के समय भी वे लोकसभा में अमेठी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। तब उन्होंने अक्तूबर 2013 में वहां एक मेगा फूड पार्क की आधारशिला रखी थी। लेकिन यह आकार नहीं ले सका। मोदी सरकार ने इसकी सैद्धांतिक मंजूरी वापस ले ली है, इस बिना पर कि यह व्यावहारिक नहीं है। इससे राहुल गांधी को यह कहने का मौका मिल गया है कि मोदी सरकार अमेठी के विकास में अड़ंगे लगा रही है। उन्होंने सरकार पर सियासी बदले की भावना से काम करने का आरोप भी जड़ा है। अपने निर्वाचन क्षेत्र के ताजा दौरे में उन्होंने एक बार फिर ये बातें दोहरार्इं। लेकिन अमेठी का मामला अकेला नहीं है जहां फूड पार्क वजूद में आने से रह गया। खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की इस योजना के तहत जिन बयालीस बड़े फूड पार्कों की मंजूरी दी गई थी, उनमें से केवल चार अस्तित्व में आ सके। कई फूड पार्कों की मंजूरी वापस ले ली गई, कुछ प्रस्तावों के स्थान और प्रमोटर बदल दिए गए। दरअसल, मेगा फूड पार्कों को लेकर कई समस्याएं हैं। इनके लिए पच्चीस से पचास एकड़ जमीन की जरूरत होगी, जो कि राज्य सरकार की मदद के बिना उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। फिर, इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए बिजली और साफ पानी की आपूर्ति से लेकर और भी कई तरह की बुनियादी ढांचागत सुविधाओं और सेवाओं की जरूरत है। प्रसंस्करण उद्योग की प्रकृति ऐसी है कि मेगा फूड पार्क में कई तरह की इकाइयां एक ही जगह लगानी होंगी।

जब यह योजना बनी तब सरकार ने जमीन को छोड़ कर बाकी ढांचागत लागत का पचास फीसद वहन करने का भरोसा दिलाया था, रियायती दर पर गैस आपूर्ति की बात भी कही थी। लेकिन अधिकतर मामलों में प्रमोटर अपेक्षित जमीन हासिल नहीं कर पाए। फिर अमेठी सहित ज्यादातर मामलों में सबसिडीयुक्त गैस मिलने में भी बाधा आई, क्योंकि तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय इस मेहरबानी के पक्ष में नहीं है। लिहाजा, इन सब दिक्कतों को देखते हुए खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को विकेंद्रित करने और छोटी इकाइयां लगाने के लिए प्रोत्साहन देने पर विचार होना चाहिए। लघु इकाइयां संबंधित इलाके में या आसपास की उपज के लिहाज से भी अनुकूल होंगी। मसलन, किसी इलाके में आंवले की पैदावार अधिक है, तो उसके प्रसंस्करण से संबंधित इकाइयां वहां ज्यादा कारगर होंगी। जबकि मेगा फूड पार्क में ढेर सारी एक-दूसरे पर निर्भर इकाइयों के लिए बहुत सारे ढांचागत प्रबंध के अलावा दूर-दूर से कच्चा माल लाने की जरूरत पड़ेगी। विडंबना यह है कि ये सवाल उठाने में किसी की दिलचस्पी नहीं दिखती।

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