जब आइपीएल क्रिकेट प्रतियोगिताओं में सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग के मामलों का खुलासा हुआ था, तब यह सवाल तीखे स्वर में उठा था कि इस खेल के पीछे अगर पैसे का तमाशा चल रहा है, तो यह दर्शकों के साथ भी बड़ा धोखा है। उसके बाद कई स्तरों पर आरोपियों की गिरफ्तारी और जांच के दौर चले, जो अब भी जारी हैं। पर इस बीच सबसे बड़ी विडंबना यह उभरी है कि जिन अधिकारियों को आइपीएल में सट्टेबाजी के आरोपों की जांच के काम में लगाया गया, उन्होंने भी आरोपियों को गिरफ्तारी से राहत देकर अपने लिए रिश्वत का इंतजाम कर लिया। किसी घोटाले और उसकी जांच के बीच यह एक ऐसी स्थिति है, जिससे पता लगाना लगभग असंभव हो जाता है कि सच क्या है, क्योंकि कोई रिश्वतखोर जांच अधिकारी अपनी अंतिम रिपोर्ट में किसी को पाक-साफ घोषित कर दे सकता है! मंगलवार को सीबीआइ ने ऐसे ही एक मामले में अमदाबाद प्रवर्तन निदेशालय के पूर्व संयुक्त निदेशक जेपी सिंह और अधीनस्थ संजय कुमार सहित चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इन सभी पर 2015-16 में आइपीएल सट्टेबाजी और सूरत हवाला कांड के आरोपियों को गिरफ्तारी से बचाने के एवज में करोड़ों रुपए की रकम वसूलने का आरोप है।

समझा जा सकता है कि उच्चस्तर पर चल रही सट्टेबाजी में लिप्त लोग किसी तरह कानून की जद में आए भी तो उन्हें बचाने में खुद जांच अधिकारी कैसे मददगार बन कर खड़े हो गए। इसके बाद जांच की दिशा और उसके नतीजे का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। पहले ही सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग के मामलों के बाद आइपीएल मैचों पर भरोसे का संकट खड़ा है और अब अगर इसकी जांच की प्रक्रिया तक भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि इसमें किस स्तर के लोग शामिल हैं। पर सवाल है कि सट्टेबाजी, स्पॉट फिक्सिंग से लेकर इसमें लिप्त लोगों के खिलाफ जांच में रिश्वतखोरी तक का शिकार आखिरकार कौन होता है? आइपीएल का समूचा ध्यान ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को आकर्षित करने पर रहता है। वह मैदान में टिकट लेकर देखने जाने वाले लोग हों या फिर टीवी पर। दर्शक इसी उम्मीद से मैच देख रहे होते हैं कि गेंदबाजी, बल्लेबाजी और फील्डिंग के स्तर पर खिलाड़ी अपनी काबिलियत दर्शाएंगे, मगर हकीकत है कि उनमें से अनेक खिलाड़ी गेंद फेंकते, बल्ला चलाते या फिर कैच पकड़ते हुए खुद को मिली रकम का ध्यान रख रहे होते हैं और विपक्षी टीम के खिलाड़ियों को फायदा पहुंचा रहे होते हैं!

इस तरह की सट्टेबाजी के रास्ते मैच या स्पॉट फिक्सिंग के खेल ने समूचे क्रिकेट की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया है। यों भी क्रिकेट में खिलाड़ियों के चयन और उसमें मिलने वाले अकूत धन की बंदरबांट को लेकर तमाम सवाल उठते रहे हैं। अब आइपीएल की शुरुआत के बाद इस खेल में होने वाली बेलगाम आमदनी के चलते ही जिला समितियों से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट संघों पर कब्जे के लिए राजनेताओं, प्रशासकों और उद्योगपतियों के बीच होड़ लगी रहती है। पिछले दो-तीन सालों के दौरान इस कुचक्र के खुलासे के बाद यह साफ हुआ था कि ललित मोदी, राज कुंद्रा, गुरुनाथ मयप्पन जैसे लोगों के तार कितने ऊपर तक जुड़े थे। सट्टेबाजी की जांच करने वाले अधिकारी की ताजा गिरफ्तारी से यही जाहिर है कि परदे के पीछे खेल करने वाले अपना दामन बचाने के लिए किसका सहारा लेते हैं।