भारत ने संकटग्रस्त फिलिस्तीन को दवा और आपदा राहत सामग्री की खेप भेज कर एक बार फिर यही साबित किया है कि वह मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों का पक्षधर है। जब भी किसी देश में इस तरह का कोई संकट खड़ा हुआ है, भारत ने वहां मदद का हाथ बढ़ाया है। कोरोना काल में जब दुनिया के अनेक देशों को दवाओं और टीके की जरूरत थी, भारत ने उन्हें खुले हाथों मदद पहुंचाई।
पीएम मोदी ने फिलिस्तीनी राष्ट्रपति को दिया था मदद का आश्वासन
फिलिस्तीन के साथ तो भारत का सदा सदाशयतापूर्ण संबंध रहा है। वह फिलिस्तीन की संप्रभुता और लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में खुल कर बोलता रहा है। हालांकि जब इजरायल पर हमास का हमला हुआ, तब भारत ने इजरायल के साथ खड़े रहने का एलान कर दिया, जिसे लेकर एक अजीब तरह का वातावरण बना कि भारत ने अपनी परंपरागत पक्षधरता बदल दी है। मगर जब गाजा के अल अहली अस्पताल पर हमला हुआ, जिसमें करीब पांच सौ लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए, तब प्रधानमंत्री ने फिलिस्तीन के राष्ट्रपति से फोन पर बात करके संवेदना प्रकट की और उन्हें हर मदद पहुंचाने का आश्वासन दिया। उस आश्वासन को पूरा करते हुए दवा और आपदा राहत सामग्री की पहली खेप रवाना भी कर दी गई है।
फिलिस्तीन की संप्रभुता बहाल होने और हक मिलने पर दिया था जोर
राहत सामग्री की खेप भेज कर भारत ने अब स्पष्ट कर दिया है कि फिलिस्तीन के मूल अधिकारों को लेकर उसके पक्ष में कोई बदलाव नहीं आया है। प्रधानमंत्री ने कुछ दिनों पहले कहा भी था कि फिलिस्तीन की संप्रभुता बहाल होनी चाहिए, उसके हक की जमीन उसे मिलनी ही चाहिए। यह ठीक है कि इजरायल के साथ भारत की नजदीकी पिछले कुछ समय से बढ़ी है और तकनीकी आदि मामलों में वहां से सहयोग भी मिला है। मगर फिलिस्तीन और इजरायल के बीच चल रहे संघर्ष में अगर भारत केवल कुछ व्यापारिक संबंधों की वजह से इजराइल के साथ खड़ा होता, तो उसकी लोकतांत्रिक पक्षधरता का प्रश्नांकित होना स्वाभाविक था।
भारत का विरोध फिलिस्तीन से नहीं, आतंकवाद को लेकर था
जब भारत ने इजरायल के साथ खड़ा होने की बात कही थी, तब उसका विरोध फिलिस्तीन नहीं, बल्कि आतंकवाद को लेकर था। भारत सदा से आतंकवाद के विरुद्ध रहा है और दुनिया के किसी भी मंच पर, जहां भी अवसर आया है, उसने आतंकवाद के खिलाफ जंग छेड़ने की बात की है। संयुक्त राष्ट्र के मंच से वह लगातार इसकी मांग उठाता रहा है। इसलिए उसने हमास के हमले का विरोध करते हुए इजरायल के प्रति संवेदना व्यक्त की थी। अब जब मामला फिलिस्तीन के अधिकारों का है, तो वह सदा की तरह संकट में उसके साथ खड़ा नजर आ रहा है।
यह ठीक है कि दुनिया आर्थिक और व्यापारिक संबंधों के आधार पर गुटों में बंटी हुई है, जिसमें शक्ति संपन्न देश सदा से एक साथ रहे हैं। इजरायल के साथ अमेरिका खुल कर खड़ा है। भारत के दोनों देशों से संबंध बेहतर हैं। मगर भारत ने केवल अपने व्यापारिक रिश्तों को तरजीह नहीं दी, मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों को ऊपर रखा। दुनिया जानती है कि फिलिस्तीन के हिस्से की बहुत सारी जमीन इजरायल ने जोर-जबर्दस्ती से छीन ली है।
अब वह फिलिस्तीन का अस्तित्व ही मिटाने पर तुला हुआ है। इसे कोई भी लोकतांत्रिक देश उचित नहीं मान सकता। अभी फिलिस्तीन और खासकर गाजा पट्टी में जैसे हालात हैं, वहां लोगों को न तो ठीक से जरूरी चीजें मिल पा रही हैं, न इलाज मिल पा रहा है। ऐसे में भारत का मदद को बढ़ा हाथ बड़ा मानवीय संबल है।
