हाल के दिनों में किए गए कुछ आर्थिक फैसलों से जिस तरह साधारण लोगों की मुश्किलें बढ़ रही हैं उससे सवाल उठने लगा है कि आखिर यह सब किसके हित में हो रहा है। नोटबंदी से लोगों को हुई परेशानियां किसी से छिपी नहीं हैं। कुछ दिन पहले एटीएम से चार बार से ज्यादा रकम की निकासी पर शुल्क वसूले जाने की खबरें आर्इं। अब एसबीआई यानी भारतीय स्टेट बैंक ने अगले महीने से बचत खातों में न्यूनतम अपेक्षित अधिशेष धन की सीमा की घोषणा की है। महानगरों में स्थित एसबीआई की शाखाओं में बचत खातों में न्यूनतम अधिशेष की सीमा पांच हजार रुपए, शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों में तीन हजार और ग्रामीण इलाकों में एक हजार रुपए होगी। इसका पालन न करने पर पचास रुपए से सौ रुपए तक जुर्माना लगाया जाएगा। एसबीआई का यह फैसला इसलिए व्यापक असर डाल सकता है कि अब इसके कई वे सहायक बैंक भी इस नियम के तहत आ जाएंगे, जिनका विलय एसबीआई में होने का प्रस्ताव है। इसके बाद अगर सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य बैंक भी ऐसे कदम उठाएं, तो उसे स्वाभाविक ही माना जाएगा।
सवाल है कि जिन लोगों को न्यूनतम अधिशेष की पहले की निर्धारित सीमा के भरोसे बैंक खाता खोलने के लिए आकर्षित किया गया था या उन्होंने खुद यह देख-समझ कर खाता खुलवाया था, नए फैसले के बाद उन लोगों को मिले उस आश्वासन का क्या होगा! ग्रामीण इलाकों की बात तो दूर, शहरी या महानगरीय क्षेत्रों में लाखों ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपनी आर्थिक सीमा के चलते वेतन या दूसरी कई सुविधाओं के लिए बैंकों की ओर से जीरो बैलेंस नियम के तहत खाते खुलवाए थे या फिर पुरानी सीमा के तहत तय रकम उनके लिए ज्यादा बोझ साबित नहीं होती थी। इसके अलावा, किसी भी क्षेत्र के उन लोगों के बारे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है, जो आमतौर पर दिहाड़ी पर निर्भर रहते हैं और रोजाना होने वाली आमदनी पर उनके घर का चूल्हा जलता है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जिन लोगों के खाते हैं भी, उनके पास कितने पैसे होते हैं, यह छिपी बात नहीं है। सिर्फ मनरेगा या दूसरे मदों के पैसे के लिए जो लोग खाता रखते हैं, उनकी मजबूरी समझना मुश्किल नहीं है।
फिर मौजूदा सरकार के जन धन योजना के तहत बैंक में शून्य राशि की सुविधा के तहत खाते खुलवाने के भरोसे पर समूचे देश के करोड़ों लोगों ने अपने खाते खुलवाए। क्या एसबीआई का फैसला उस भरोसे और उन ग्राहकों की आर्थिक स्थिति को खारिज नहीं करता है? करीब साल भर पहले आरटीआइ के तहत सामने आई एक जानकारी के मुताबिक बैंकों में जीरो बैलेंस वाले खातों की संख्या में कमी करने के लिए खुद कर्मचारियों ने अपनी जेब से एक-एक रुपए उन खातों में जमा कराए। यह अपने आप में बताने के लिए काफी है कि कुछ सेवाओं के लिए अनिवार्यता की वजह से लोग खाते खुलवाते हैं, लेकिन कई वजहों से वे अपने खाते में पैसा नहीं रख पाते हैं। ऐसा उनकी सुविधा या फिर किसी मजबूरी के चलते हो सकता है। शायद इन्हीं हकीकतों के मद्देनजर सरकार ने एसबीआइ से अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा है। लेकिन अगर एसबीआइ का ताजा फैसला अमल में आता है तो यह न सिर्फ गरीब तबके के खिलाफ होगा, बल्कि इसका असर खुद बैंकों की विश्वसनीयता पर भी पड़ेगा।

