उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रशासनिक सुधार के लिए कई ऐसे कदम उठाए हैं, जिनके अमल में आने के बाद राज्य की भावी तस्वीर बेहतर होने की उम्मीद बंधी है। इसी क्रम में सरकारी छुट््िटयों में कटौती एक अहम पहलकदमी है, जिसे कार्य-संस्कृति को बढ़ावा देने वाले फैसले के रूप में देखा जा रहा है। मंत्रिमंडल की मंजूरी के साथ ही साल भर में पंद्रह दिनों की ऐसी छुट््िटयां खत्म कर दी गई हैं, जो कई महापुरुषों के नाम पर मिलती रही हैं या फिर किसी त्योहार के मौके पर। इस फैसले की अहम बात यह है कि इन छुट््िटयों के दिन सरकारी दफ्तर और स्कूल-कॉलेज खुले रहेंगे, लेकिन उस दिन वहां संबंधित महापुरुष के जीवन पर आधारित किसी कार्यक्रम का आयोजन होगा, ताकि उनके बारे में जानकारी का प्रसार हो सके और लोग उनसे प्रेरणा लें। यानी इस पहलकदमी में यह ध्यान रखा गया है कि किसी महापुरुष के नाम पर मिलने वाली छुट््टी को लोग यों ही जाया न करें, बल्कि उस दिन वे उनके जीवन के बारे में जानें-समझें और उनके विचारों का प्रसार हो।
जाहिर है, अगर कोई यह कहता है कि किसी महापुरुष के नाम पर मिल रही छुट््टी को खत्म करना उनका अपमान है, तो यह दलील बेमानी होगी। यों भी, किसी महत्त्वपूर्ण शख्सियत की स्मृति में अगर छुट््टी मिल रही है, तो उस दिन का महत्त्व उनको याद करने में ही है। जिन छुट््िटयों को खत्म करने की मंजूरी मिली है, उनके बारे में यही माना जाता है कि वे पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी की सरकार ने समाज के अलग-अलग समुदायों को खुश करने या फिर उनका वोट सुनिश्चित करने के मकसद से उनकी सामुदायिक पहचान के किसी महापुरुष के नाम पर घोषित की थीं। लेकिन इस क्रम में सार्वजनिक अवकाशों को मिला कर कुल छुट््िटयों के दिनों की संख्या कार्य दिवसों के मुकाबले बराबर या फिर ज्यादा हो गई। उत्तर प्रदेश में अब तक सार्वजनिक अवकाशों की संख्या चालीस रही है। इसके अलावा, साप्ताहिक और दूसरी छुट््िटयां भी होती हैं। यानी ताजा घोषणा की पृष्ठभूमि में इतनी बड़ी तादाद में अवकाशों का होना भी रहा है। साल भर में अगर आधा या उससे ज्यादा वक्त छुट््िटयों में ही गुजर जाए तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसका सरकारी कामकाज या स्कूल-कॉलेजों की पढ़ाई-लिखाई पर क्या असर पड़ता होगा।
स्कूल-कॉलेजों में लगातार पढ़ाई-लिखाई मानसिक बोझ न बने या सरकारी कार्यालयों में कामकाज की निरंतरता से कर्मचारियों के भीतर तनाव की स्थिति न पैदा हो, इसके लिए काम के बीच अंतराल या आराम के लिए साप्ताहिक या दूसरे अवकाशों की व्यवस्था एक मानवीय जरूरत है। सांस्कृतिक तकाजों की वजह से भी कुछ दिनों की छुट््िटयां तय की जाती हैं। इसके अलावा, काम की अवधि तय करने को लेकर बड़े संघर्षों के बाद आठ घंटे का मानक तय हुआ। आज भी कामकाज के हालात को ज्यादा से ज्यादा मानवीय बनाने को लेकर दुनिया भर में बहस जारी है। लेकिन अगर कुल मिला कर इसका हासिल यह सामने आ रहा हो कि छुट््िटयों का मतलब केवल आराम और कार्य-संस्कृति में गिरावट हो जाए, तो उस पर पुनर्विचार जरूरी है। इस लिहाज से उत्तर प्रदेश सरकार का ताजा फैसला स्वागतयोग्य है। जरूरत इस बात की है कि कार्य-संस्कृति का ऐसा ढांचा तैयार हो, जिसमें मानवीयता का हनन न हो और सबकी उपयोगिता का लाभ उठाया जा सके।
