नीति आयोग ने चुनाव आयोग को 2024 से लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का सुझाव दिया है। उसने कहा है कि पहली बार कुछ विधानसभाओं के कार्यकाल में विस्तार या कटौती करनी पड़ सकती है। इस मसविदे को हाल में नीति आयोग की संचालक परिषद को सौंपा गया है, जिसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री भी सदस्य होते हैं। नीति आयोग ने संबंधित पक्षकारों का कार्यसमूह गठित करके एक खाका तैयार कराने की बात भी कही है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों चुनावों को एक साथ कराने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए क्योंकि इससे अलग-अलग समय पर होने वाला लंबा-चौड़ा खर्च कम हो जाएगा। पूर्व चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा ने इस पर एक टिप्पणी भी तैयार की थी। इसके बाद से चुनाव आयोग में इस पर विचार चल रहा है।

लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का विचार बहुत नया हो, ऐसा भी नहीं है। पिछली सरकारों में भी समय-समय पर इस पर चर्चाएं होती रही हैं। विधि एवं न्याय विभाग से जुड़ी संसद की स्थायी समिति द्वारा दिसंबर 2015 में अपनी एक रिपोर्ट में एक साथ चुनाव कराने का समर्थन करने के बाद सरकार ने इस विषय पर चुनाव आयोग से राय मांगी थी। जनवरी 2017 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि दोनों चुनाव साथ कराने से खर्च और प्रबंधन के संदर्भ में कठिनाइयों को कम करने में मदद मिल सकती है। राष्ट्रपति ने कहा था कि भारतीय मतदाता काफी परिपक्व हो चुका है। हालांकि, चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने दोनों चुनाव साथ कराने के प्रति कोई असहमति तो नहीं व्यक्त की थी, लेकिन बीती जनवरी में उन्होंने कहा था कि इसके लिए संविधान संशोधन और अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत पड़ेगी। चुनाव आयोग के मुताबिक दस हजार करोड़ रुपए, अधिक संख्या में ईवीएम और भारी सुरक्षा बलों की जरूरत पड़ेगी। सैद्धांतिक रूप से सहमति तो चुनाव आयोग ने दे दी है लेकिन ज्यादा कठिनाई इसे अमली जामा पहनाने में आएगी। सबसे पहले संविधान में संशोधन करना होगा, जिसके लिए सभी राजनीतिक दलों को इस पर एकमत कर पाना टेढ़ी खीर होगा।

एक साथ चुनाव कराने का मतलब होगा कि जिन राज्यों में सरकारों का कार्यकाल पूरा नहीं हुआ है, उसे खत्म करना और जहां पूरा गया है, उसे बढ़ाना। ऐसे राजनीतिक दल हो सकते हैं, जिन्हें लगे कि इस प्रक्रिया में उनका नुकसान हो सकता है तो वे अपना पैर पीछे भी खींच सकते हैं। मान लीजिए, राजनीतिक दल निजी नफा-नुकसान छोड़ कर संशोधन पर सहमत हो जाते हैं तो एक दूसरी समस्या पैदा होगी कि अनुच्छेद 356 का क्या होगा क्योंकि खंडित जनादेश होने, सरकार अल्पमत में आने या किसी भी अन्य मुश्किल में सरकार का गठन न होने पर इसी अनुच्छेद के तहत राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है और छह महीने में चुनाव कराने के लिए कहा जाता है। दोनों चुनाव एक साथ कराने का कानून अगर बनता है तो जाहिर है कि इस अनुच्छेद को खत्म करना होगा। एक आशंका और है कि अगर अनिवार्य रूप से सरकार बनाने का प्रावधान लागू किया जाता है तो खरीद-फरोख्त और जोड़-तोड़ का खतरा बढ़ जाएगा। इन सबके बावजूद, अगर सारी शंकाओं को किनारे रखते हुए कोई सर्वमान्य रास्ता निकलता है तो सचमुच यह देश, समाज और लोकतंत्र के हित में होगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।