इस साल फिर देश के कई राज्य भीषण बाढ़ की चपेट में हैं और उन इलाकों में रहने वाले लाखों लोग जिंदा रहने की चुनौती से दो-चार हैं। बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश सहित आठ राज्यों में बाढ़ का कहर जितना कुदरती है उससे ज्यादा यह सरकारों के काम करने के तरीके, पूर्व तैयारी और प्रबंधन में घोर लापरवाही का सबूत है। अब तक दो सौ से ज्यादा लोगों की मौत की खबरें आ चुकी हैं और इसके लिए सरकारी महकमों की लापरवाही और आपदा प्रबंधन का लचर तंत्र जिम्मेवार है। यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि भूकम्प के बरक्स बाढ़ कभी अचानक नहीं आती, इसके संकेत पहले से ही मिलने लगते हैं। लेकिन शायद ही कभी सरकारों ने इससे बचाव के लिए पर्याप्त पूर्व तैयारी की जरूरत महसूस की हो। नतीजतन, बाढ़ जब अपनी तीव्रता के साथ रिहाइशी इलाकों में फैलती है तो बहुत कुछ तबाह कर डालती है। कुदरत के चक्र को रोका नहीं जा सकता, पर इस तरह की तबाही जरूर कम की जा सकती है।
जहां तक बिहार का सवाल है, वहां बाढ़ से जन-जीवन तबाह होना आमतौर पर हर साल की त्रासदी है। लेकिन इस वर्ष बिहार के उत्तर-पूर्वी इलाके में बाढ़ की विभीषिका ने एक बार फिर 2008 में कोसी इलाके में बाढ़ से हुई जान-माल की व्यापक तबाही की याद दिला दी है। तब ढाई सौ से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी, लगभग तीस लाख लोग बेघर हो गए थे और करीब साढ़े आठ लाख एकड़ में लगी फसलें नष्ट हो गई थीं। इस साल फिर चौदह जिलों के एक सौ दस प्रखंडों के लगभग चौहत्तर लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और बहत्तर लोगों की जान जा चुकी है। इतने बड़े इलाके और इतनी बड़ी तादाद में प्रभावित लोगों के बीच राष्ट्रीय आपदा राहत बल ने सत्ताईस दल बचाव कार्य के लिए उतारे हैं। यह तथ्य सभी जानते हैं कि हर साल मानसून आते ही नेपाल के पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश होती है। फिर बरसात का पानी कोसी, बागमती और नारायणी नदियों से होते हुए बिहार के मैदानी इलाकों तक पहुंचता है।
हालांकि बचाव के लिए कोसी पर बांध बनाए गए हैं, लेकिन पानी को रोकने की उसकी भी सीमा है। नेपाल में स्थित उस बांध और उस पर बने गेट को भारतीय इंजीनियर संचालित करते हैं। यानी एक ओर मौसम, बारिश, पानी की मात्रा आदि के पूर्व आकलन में लापरवाही न बरती जाए, और दूसरी ओर, बाढ़ के फैलने वाले इलाकों में बचाव की पूर्व तैयारी की जाए तो बड़ी तबाही से बचा जा सकता है। विडंबना यह है कि बाढ़ से होने वाली बर्बादी को रोकने के लिए सरकारें तटबंधों को अंतिम हल मान लेती हैं। लेकिन सच यह है कि जैसे-जैसे तटबंधों का विस्तार हुआ है, धारा बाधित होने से नदियां बेलगाम हुर्इं और इसी के साथ बाढ़ की समस्या भी बढ़ती गई है। फिर भारी बारिश और पानी का जोर बढ़ने से कई बार नदियों के तटबंध टूटते हैं और निचले इलाकों में भयानक तबाही मचती है। अमूमन हर बार बाढ़ की विभीषिका झेलने के बाद भी सरकार और आपदा प्रबंधन महकमों को कोई सबक लेना जरूरी नहीं लगता है। यह बेवजह नहीं है कि असम और पश्चिम बंगाल के बाढ़ प्रभावित इलाकों में भी बिहार जैसे ही हालात हैं।