वित्तमंत्री अरुण जेटली पिछले दिनों यह संकेत दे चुके थे कि नोटबंदी के चलते अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ने और इसके फलस्वरूप सरकारी खजाने पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका बेबुनियाद है। इसके विपरीत, उन्होंने नोटबंदी के बाद राजस्व में इजाफे का दावा किया था और सोमवार को इसके आंकड़े भी पेश कर दिए। स्वाभाविक ही, बहुत-से लोगों को यह चौंकाने वाला लगा होगा। नोटबंदी से आर्थिक सुस्ती आने की चिंताओं को सुनी-सुनाई बातों पर आधारित करार देते हुए जेटली ने बताया कि दिसंबर में अप्रत्यक्ष कर संग्रह 14.2 फीसद बढ़ा है; इसमें उत्पाद शुल्क में भी खासा इजाफा हुआ है। निश्चय ही इन आंकड़ों को खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये आंकड़े किसी अनुमानित राशि के बारे में नहीं हैं, बल्कि उस राशि के बारे में हैं जो सरकार को हासिल हो चुकी है। लेकिन क्या सचमुच तस्वीर वैसी ही है, जैसी वित्तमंत्री दिखाना चाहते हैं? यह सही है कि अप्रत्यक्ष कर संग्रह दिसंबर में करीब चौदह फीसद बढ़ा, लेकिन नवंबर और अक्तूबर से तुलना करें तो यह काफी कम है। नवंबर में यह आंकड़ा 23.1 फीसद और अक्तूबर में 30.5 फीसद था।

जाहिर है, वित्तमंत्री ने जिस आंकड़े को उपलब्धि की तरह पेश किया है, वह अक्तूबर के मुकाबले लगभग आधा है। वित्तमंत्री इस तथ्य पर भी गदगद हैं कि दिसंबर में उत्पाद शुल्क 31.6 फीसद बढ़ा। लेकिन गौर करें कि उत्पाद शुल्क अक्तूबर में 40.90 फीसद बढ़ा था। लिहाजा, अंदाजा लगाया जा सकता है कि नोटबंदी के बाद अप्रत्यक्ष कर संग्रह का ग्राफ चढ़ा है, या नीचे आया है? ध्यान देने की बात यह भी है कि अप्रत्यक्ष कर संग्रह में किस स्रोत का योगदान कितना है। कंपनियों के मुनाफे पर लगने वाले करों की वसूली में अप्रैल से दिसंबर के बीच सिर्फ 4.4 फीसद की वृद्धि हुई है, जबकि मैनुफैक्चरिंग और पेट्रोलियम पर लगने वाले अप्रत्यक्ष करों से मिले राजस्व में तैंतालीस फीसद की। यह तथ्य अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि राजस्व बढ़ोतरी में किनका योगदान कैसा है! वित्तमंत्री के ताजा बयान से तीन दिन पहले केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने मौजूदा वित्तवर्ष में जीडीपी की दर पिछली बार से घट कर 7.1 फीसद रहने का अनुमान जताया है। तमाम अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वास्तव में कमी सीएसओ के अनुमान से कहीं ज्यादा होगी।

यही नहीं, आॅल इंडिया मैनुफैक्चरर्स आर्गनाइजेशन ने पिछले दिनों एक बयान जारी कर कहा है कि नोटबंदी के बाद पहले पैंतीस दिनों में मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र में पैंतीस फीसद नौकरियां जा चुकी हैं। दूसरी ओर, खुद ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक नोटबंदी के बाद मनरेगा के तहत रोजगार की मांग साठ फीसद बढ़ी है। मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र में रोजगार टूटने, शहरों से श्रमिकों के गांव लौटने और मनरेगा के तहत काम की मांग में जबर्दस्त बढ़ोतरी में सीधा संबंध दिखता है। अप्रत्यक्ष कर संग्रह में जिस बढ़ोतरी की जानकारी वित्तमंत्री ने दी है, उसे सही परिप्रेक्ष्य में तभी जा सकता है जब उसकी तुलना अक्तूबर और पिछले साल के अक्तूबर से दिसंबर के आंकड़ों से की जाए। विडंबना यह है कि सरकार ने अप्रत्यक्ष कर संग्रह के आंकड़े पेश कर नोटबंदी के नकारात्मक असर की आशंका को तो अपनी तरफ से खारिज कर दिया, पर अभी तक इसके आंकड़े नहीं जारी किए हैं कि काले धन से निपटने में कितनी कामयाबी मिली है; कितना काला धन जब्त हुआ है, जबकि नोटबंदी की समय-सीमा खत्म हुए बारह दिन हो चुके हैं।