सरकार नोटबंदी के अपने फैसले को उचित ठहराने का चाहे जितना जतन करे, पर उसकी वजह से अर्थव्यवस्था को पहुंची चोट के निशान अब उभरने लगे हैं। चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही के आंकड़ों में दिखाया गया कि विमुद्रीकरण का आर्थिक विकास दर पर कोई खास असर नहीं पड़ा; नोटबंदी के दौरान भी विकास दर सात फीसद बनी रही। प्रधानमंत्री ने उन आंकड़ों से उत्साहित होकर अपनी सरकार की कर्मठता का श्रेय भी लूट लिया। मगर आर्थिक विशेषज्ञों ने उसी दिन उन आंकड़ों पर अंगुलियां उठानी शुरू कर दीं और जाहिर हो गया कि नोटबंदी को उचित ठहराने की गरज से विकास दर के आंकड़ों से खिलवाड़ किया गया। विमुद्रीकरण के दौरान चौतरफा कारोबारी गतिविधियों में मंदी देखी गई, मगर सरकार ने कभी इसका आंकड़ा जारी नहीं किया कि वास्तव में नोटबंदी की वजह से अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान पहुंचा। जबकि एक दिन की भी हड़ताल होती है या उपद्रव की वजह से बाजार बंद होते हैं तो आर्थिक संस्थाएं तुरंत आंकड़े पेश कर देती हैं कि उससे अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान हुआ। हैरानी की बात है कि नोटबंदी के फैसले को लेकर सूचनाधिकार के तहत पूछे गए सवालों को भी सरकार दरकिनार करती रही है। हालांकि कुछ बैंकों और जमीन-जायदाद के कारोबार पर नजर रखने वाली एजेंसियों ने अपने तर्इं कराए अध्ययनों से यह तथ्य उजागर करना शुरू कर दिया है कि नोटबंदी ने रोजगार और कारोबार पर कितना बुरा प्रभाव डाला और इससे विकास दर की गति कितनी धीमी हुई। नोटबंदी की सबसे अधिक मार जमीन-जायदाद के कारोबार यानी रियल एस्टेट पर पड़ी। तैयार रिहाइशी भवनों के खरीदार एकदम से घट गए।
हालत यह हो गई कि मकानों-दुकानों का बाजार भाव सर्किल रेट से भी नीचे चला गया। उधर मकानों का पंजीकरण करने वाले कार्यालयों ने सर्किल रेट से कम पर रजिस्ट्री करने से इनकार कर दिया। जाहिर है कि रियल स्टेट को सबसे अधिक मंदी की मार झेलनी पड़ी।रियल स्टेट में मंदी का असर कई तरह के कारोबार पर पड़ा। बैंकों के कर्ज कारोबार की रफ्तार थम गई। भवन निर्माण सामग्री का कारोबार ठप पड़ गया। दिहाड़ी मजदूरों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा। अब इसके भी आंकड़े सामने आने शुरू हो चुके हैं कि नोटबंदी के दौरान बहुत सारे छोटे कारोबार बंद हो गए और मजदूरों को अपने गांव वापस लौटने पर मजबूर होना पड़ा। गांव में मनरेगा के तहत काम उनका आंशिक सहारा बना, लेकिन वहां भी नकदी की कमी का असर साफ था। इस संदर्भ में मनरेगा के तहत रोजगार का आंकड़ा बेशक सरकार बढ़ा हुआ दिखा दे, पर शहरों में रोजगार में आई कमी को वह कैसे छिपाएगी? वाहन और मकान की खरीद की खातिर लिए जाने वाले कर्ज में कमी आने से बैंकों को काफी नुकसान उठाना पड़ा। अब भी इस मामले में गति नहीं आ पाई है। फिर नोटबंदी के दौरान पुराने नोट बदलने और नए पहुंचाने में जिस तरह बैंकों को दिन-रात काम का जो आर्थिक बोझ वहन करना पड़ा, इसका हिसाब-किताब अभी जाहिर नहीं है। सरकार का लक्ष्य विकास दर को आठ फीसद तक पहुंचाने का है। मगर इस तरह आंकड़ों की बाजीगरी करके वह भले अपने कामकाज को बेहतर दिखाने का प्रयास कर ले, पर अर्थव्यवस्था की सेहत पर उसका बुरा असर ही पड़ेगा। खोखली अर्थव्यवस्था का खमियाजा किस तरह देश की सेहत पर पड़ता है, इसके कई देश उदाहरण हैं। ऐसे में सरकार को हकीकत का सामना करने से नहीं बचना चाहिए।

