जनसत्ता 14 अक्तूबर, 2014: चक्रवाती तूफान आने की खबर से खासकर आंध्र प्रदेश और ओड़िशा में दहशत का आलम था। लेकिन तूफान का कहर वैसा नहीं हुआ, जैसी आशंका थी। इससे देश ने राहत की सांस ली है। अलबत्ता हुदहुद नाम के इस तूफान और भारी बारिश ने छह लोगों की जान ले ली, तीन आंध्र में और तीन ओड़िशा में। साल भर पहले भी देश के इसी हिस्से में फेलिन नामक तूफान आया था, जिसमें सत्रह लोग मारे गए थे। तब भी जान-माल का नुकसान पहले के अंदेशों के मुकाबले कम हुआ था। उस समय भी तूफान की चेतावनी काफी पहले जारी कर दी गई थी और उससे निपटने के लिए तैयारी का पर्याप्त वक्त मिल गया था। इस बार भी मौसम विभाग ने पांच दिन पहले चक्रवाती तूफान आने की चेतावनी दे दी थी। बीच-बीच में जो सूचनाएं जारी की गर्इं वे भी सटीक निकलीं, जिससे गलतफहमी की कोई गुंजाइश नहीं रही। अगर पिछले साल की तुलना में इस बार नुकसान का आंकड़ा और भी कम रहा, तो तैयारी के लिए मिले वक्त के अलावा एक खास वजह यह भी है कि हुदहुद की रफ्तार फेलिन से कम थी।
फेलिन की गति दो सौ किलोमीटर प्रति घंटा थी, जबकि हुदहुद की एक सौ सत्तर से एक सौ अस्सी के बीच; अपने चरम पर जरूर थोड़े समय के लिए यह दो सौ किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पर पहुंच गया था। पंद्रह साल पहले ओड़िशा में आए चक्रवाती तूफान ने हजारों लोगों को मौत की नींद सुला दिया था। उस तूफान की रफ्तार ढाई सौ किलोमीटर प्रति घंटा थी। यानी अभी आए तूफान से पचास किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा का अंतर था। लेकिन 1999 में ओड़िशा में बड़े पैमाने पर मची त्रासदी का एक प्रमुख कारण आपदा से निपटने का मुकम्मल बंदोबस्त न होना भी था। जाहिर है, देश के आपदा नियंत्रण तंत्र ने पहले के अनुभवों से बहुत कुछ सीखा है। सुपर कंप्यूटर और डापलर राडार की तकनीकी उपलब्धियों की बढ़ती उपयोगिता साबित हुई है। तूफान की भनक पाने और चेतावनी प्रसारित करने की दक्षता बढ़ी है। आपदा कार्रवाई बल, राज्यों के प्रशासन और सेना के बीच ऐसे समय समन्वय भी बढ़ा है। फेलिन से पहले उत्तराखंड की बाढ़ के समय आपदा नियंत्रण तंत्र लाचार नजर आ रहा था, राज्य सरकार के स्तर पर और भी कोताही का आलम था। लेकिन एक फर्क यह भी था कि उत्तराखंड के सैलाब से सावधान होने का समय नहीं मिला था, वह अचानक बादल फटने से आया था। अलबत्ता वह उतना भयावह साबित नहीं होता, अगर नदियां अतिक्रमण और ऐन किनारे तक वैध-अवैध निर्माण का शिकार न होतीं।
यही बात जम्मू-कश्मीर में आई बाढ़ की बाबत भी कही जा सकती है। इसलिए हुदहुद के बड़ी मुसीबत का रूप न लेने से यह खुशफहमी नहीं होनी चाहिए कि हम हर तरह की आपदा को बेअसर करने में सक्षम हो गए हैं। इसका अर्थ यह भी है कि चेतावनी की प्रणालियों को और मजबूत करते हुए, राहत और बचाव के उपायों को अधिक कारगर बनाते हुए हमें कुछ और तकाजों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। नदियों और समुद्र के किनारे अतिक्रमण को रोकना होगा, इस बारे में बने नियम-कायदे कड़ाई से लागू करने होंगे। तटीय वनों के संरक्षण पर ध्यान देना होगा। यों हर तरह के जंगल विकास के नाम पर नष्ट किए जा रहे हैं, पर संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि अन्य वनों के मुकाबले मैंग्रोव यानी समुद्रतटीय वनों के नष्ट होने की रफ्तार तीन से पांच गुना ज्यादा है। आपदा प्रबंधन की नीति में दूसरी तैयारियों के साथ-साथ कुदरती कवच को बनाए रखने पर भी जोर होना चाहिए।
