जनसत्ता 14 अक्तूबर, 2014: करीब तीन महीने पहले इबोला के विषाणुओं के जानलेवा संक्रमण और गंभीर खतरे को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी बताते हुए वैश्विक स्वास्थ्य-आपातकाल की घोषणा की थी। लेकिन रोकथाम की तमाम कोशिशों के बावजूद इस साल अब तक इबोला की चपेट में आकर दुनिया के अलग-अलग देशों में जान गंवाने वाले लोगों की तादाद चार हजार से ऊपर पहुंच चुकी है। भारत के लिए फिलहाल यह राहत की बात है कि यहां अभी तक इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है। पर सावधानी बरतने की जरूरत हमारे लिए भी है। हमारे देश में चिकित्सा तंत्र की दो हालत है उसमें मामूली-सी चूक या लापरवाही भी महंगी पड़ सकती है। इसलिए दूसरे देशों से भारत में प्रवेश के तमाम रास्तों पर गहन जांच की व्यवस्था कर कम से कम बचाव के इंतजाम जरूर किए जाने चाहिए। दुनिया के सबसे विकसित देशों का चिकित्सा तंत्र भी इस रोग के सामने लाचार नजर आ रहा है और अब भी यह बीमारी लाइलाज है। इबोला के विषाणु सबसे पहले 1976 में सूडान और कांगो में पाए गए थे और उसके बाद उप-सहारा के उष्णकटिबंधीय इलाकों में भी फैल गए थे। तब से कोई भी साल ऐसा नहीं गुजरा जब इसका असर देखने में न आया हो। तब से लगभग हर साल कम से कम एक हजार लोग इसकी जद में आते रहे हैं। जब भी इबोला का कहर चर्चा में आ जाता है, सारे विकसित देश अपने यहां इससे निपटने के तमाम इंतजाम करते हैं, हवाई अड्डों समेत सभी प्रवेश-स्थलों पर लोगों की गहन स्वास्थ्य-जांच की जाती है। लेकिन एक खास समय तक कहर बरपाने के बाद इस बीमारी का जोर कम हो जाता है और इसके बाद फिर सब कुछ पहले की तरह आश्वस्ति-भाव से चलने लगता है। शायद यही बेफिक्री इबोला के बेलगाम हो जाने की एक बड़ी वजह है।

गौरतलब है कि बंदर, चमगादड़ और सूअर के खून या शरीर के तरल पदार्थ से फैलने वाले इबोला वायरस की चपेट में अगर कोई इंसान आ जाता है तो उसके बाद इस पर काबू पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। अगर प्रभावित व्यक्ति को पूरी तरह से अलग-थलग न रखा जाए और उसकी देखरेख में लगे लोग उच्चस्तर के सुरक्षा इंतजामों से लैस न हों तो यह तुरंत आसपास के दूसरे लोगों में फैल सकता है। इसका खतरा ज्यादा घातक इसलिए है कि अभी तक इस बीमारी का कोई इलाज या टीका नहीं खोजा जा सका है। इसकी जद में आए व्यक्ति को पहले बुखार आता है, फिर यह सिर और मांसपेशियों के दर्द के अलावा यकृत और गुर्दे तक को बुरी तरह अपनी चपेट में ले लेता है। इसमें पहले भीतरी, फिर बाहरी रक्तस्राव के बाद मरीज के बचने की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है। यही नहीं, इस रोग से प्रभावित व्यक्ति की अगर मौत हो जाती है और उसके शरीर को सुरक्षित तरीके से पूरी तरह नष्ट नहीं किया गया तो आसपास इसके वायरस की जद में दूसरे लोग भी आ सकते हैं। इस बार अफ्रीकी देश गिनी के दूरदराज वाले इलाके जेरेकोर से शुरू हुआ इबोला वायरस का संक्रमण सिएरा लियोन, लाइबेरिया और कुछ हद तक नाइजीरिया जैसे देशों तक सिमटा हुआ है। लेकिन अगर सौ फीसद सावधानी नहीं बरती गई तो कहीं भी एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।

 

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