जनसत्ता 3 अक्तूबर, 2014: राजनीतिक दलों से अपना कोष जुटाने और चुनाव खर्च आदि में पारदर्शिता बरते जाने की मांग लंबे समय से उठती रही है, मगर इस पर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। आखिरकार निर्वाचन आयोग को इस मामले में कड़ा रुख अपनाना पड़ा। आयोग ने दिशा-निर्देश दिया है कि राजनीतिक दलों को अपना कोष बैंक में जमा कराना होगा। उम्मीदवारों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता की तय सीमा किसी भी हाल में पार नहीं की जा सकती। उन्हें चंदा लेने के मामले में पूरी तरह पारदर्शिता बरतनी होगी। चंदा देने वाले उन सभी व्यक्तियों, संस्थाओं और कंपनियों के नाम और पते दर्ज करना होगा। पार्टियों के कोषाध्यक्षों को निचले स्तर से लेकर ऊपर तक जुटाए गए सभी प्रकार के कोषों और बैंक खातों पर निगरानी रखनी होगी। बीस हजार से अधिक रकम का भुगतान नगद नहीं किया जा सकेगा। इस दिशा-निर्देश से राजनीतिक दलों की वित्तीय मनमानी पर कुछ रोक लगने की उम्मीद की जा रही है। मगर जिस तरह चुनावों में लगातार आडंबर और खर्चे बढ़ते जा रहे हैं, उसमें इन नियमों से बचने का कोई गलियारा वे नहीं निकालेंगी, दावा करना मुश्किल है।

निर्वाचन आयोग ने यह दिशा-निर्देश दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले के बाद जारी किया है, जिसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों को विदेशी कंपनियों से चंदा लेने के मामले में प्रथम दृष्टया दोषी पाया गया था। तब अदालत ने निर्वाचन आयोग को यह भी निर्देश दिया था कि राजनीतिक दलों के इस तरह के वित्तीय लेन-देन पर अंकुश लगाने के उपाय जुटाए। दोनों दलों ने लंदन स्थित वेदांता रिसोर्सेज की सहायक कंपनियों से चंदे के रूप में करोड़ों रुपए लिए थे। उनकी दलील थी कि चूंकि वे सहायक कंपनियां भारत में काम करती हैं इसलिए उनसे चंदा लेना एफसीआरए यानी विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। मगर जिन सहायक कंपनियों का हवाला दिया गया था उनमें पचास फीसद से अधिक हिस्सेदारी वेदांता की है। इसलिए कहना मुश्किल है कि इस तरह चंदा लेने की एवज में इस कंपनी की विभिन्न राज्यों में स्थित सहायक कंपनियों को बेजा फायदा न पहुंचाया गया होगा। जबकि एफसीआरए के मुताबिक राजनीतिक दलों को किसी भी विदेशी स्रोत से चंदा लेने पर पाबंदी है। लोक प्रतिनिधित्व कानून भी सार्वजनिक उपक्रमों से इस तरह का अंशदान लेने की इजाजत नहीं देता। मगर यह सब जानते-बूझते कांग्रेस और भाजपा ने नियम-कायदों को दरकिनार कर अपने कोष को प्राथमिकता दी, तो आगे वे ऐसा नहीं करेंगे, कहा नहीं जा सकता!

चुनावों में उम्मीदवारों को पार्टी की तरफ से मिलने वाले अंशदान और प्रचार-प्रसार में खर्च की सीमा तय है, मगर कोई भी उम्मीदवार इसका पालन करता नहीं दिखता। निर्वाचन आयोग के खर्च का ब्योरा मांगे जाने पर झूठे कागजात सौंप दिए जाते हैं। फिर राजनीतिक दलों को यकीन रहता है कि आचार संहिता आदि के मामले में निर्वाचन आयोग के हाथ बंधे हैं, वह कोई सख्त कार्रवाई नहीं कर सकता। यही वजह है कि चुनाव खर्च में पारदर्शिता बरते जाने की मांग उठती रहने के बावजूद सभी दल लगभग आम सहमति से इस पर चुप्पी साधे रहते हैं। इसी का नतीजा है कि राजनीतिक दलों को भी आरटीआइ के दायरे में लाने के फैसले को गति नहीं मिल पाई। निर्वाचन आयोग के ताजा फैसले के बाद भले पार्टियों को अपना कोष बैंकों में रखने, लेन-देन का विवरण तैयार करने पर मजबूर होना पड़े, पर जो बहुत सारा धन बगैर किसी पारदर्शिता के उन तक पहुंचता है, उस पर रोक लगाने का क्या उपाय हो सकता है।

 

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