पिछले करीब दो महीने से पूर्णबंदी के दौरान देश भर से जिस तरह की त्रासदी की खबरें आ रही हैं, वे दहला देने वाली हैं। खासतौर पर पूर्णबंदी की वजह से रोजी-रोटी छिन जाने के बाद लाचार हो गए मजदूर और गरीब तबकों के लोगों के तकलीफदेह हालात किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को परेशान कर देने के लिए काफी हैं। शहरों में फैक्ट्रियों पर तालाबंदी की वजह से रोजगार छिन जाने और किराए के कमरों से बाहर हो जाने की मजबूरी में लाखों लोगों के पास अपने-अपने गांव लौट जाने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं बचा। आवाजाही का कोई साधन नहीं होने की वजह से हजार या दो हजार किलोमीटर दूर अपने घर की ओर पैदल ही चल देने की जीवंत तस्वीरें यह बताने के लिए काफी हैं कि इस महामारी की वजह से पैदा हुई अव्यवस्था ने लाखों लोगों की तकलीफों को किस स्तर तक बढ़ा दिया। बहुत सारे ऐसे उदाहरण सामने आए, जिसमें दुखों के पहाड़ का सामना करते लोग अकल्पनीय जीवट और साहस के साथ लंबी दूरी तय कर अपने घर पहुंच सके। हालांकि इस बीच भूख या थकान से लोगों के टूट जाने की खबरें भी आईं, जिन्हें व्यवस्थागत नाकामी के नतीजे के तौर पर देखा जाना चाहिए।

इस बीच एक हैरान कर देने वाला वाकया दुनिया ने देखा कि हरियाणा के गुरुग्राम में जब पहले से ही परेशान एक व्यक्ति मोहन पासवान पूर्णबंदी की वजह से बिल्कुल लाचार हो गए तो उन्हें उनकी तेरह साल की बेटी ज्योति साइकिल पर बिठा कर बिहार के दरभंगा स्थित अपने गांव सिरहुल्ली की ओर चल पड़ी। ज्योति ने जो हौसला दिखाया, वह कल्पना से बाहर की बात थी। यह अपने आप में सबके लिए चौंकाने वाला दृश्य था कि एक बच्ची अपने पिता को साइकिल पर लेकर इतनी दूर निकल पड़ने की हिम्मत के साथ सड़क पर चली जा रही थी। इस बच्ची को देख कर कुछ लोगों ने मदद की और तारीफ भी। लेकिन उसके इस सफर के पीछे किस तरह का दर्द था, शायद उसे भी दर्ज किए जाने की जरूरत है। उसकी इस जीवटता को देखते हुए भारतीय साइकिलिंग महासंघ की ओर से उसे मौका देने का भरोसा दिया गया है। खोजा जाए तो ऐसी बेहतरीन प्रतिभाएं ग्रामीण इलाकों के साधनहीन तबकों के बीच आम होती हैं, लेकिन मौका नहीं मिल पाने की वजह से गुम ही रह जाती हैं।

अपना मूल स्थान या गांव छोड़ कर कोई भी शहर की ओर रोजी-रोटी की तलाश में बेहद मजबूरी में ही निकलता है। ज्यादातर लोगों के पास दिहाड़ी के बूते चूल्हा जलाने और किसी तरह किराए के एक कमरे में वक्त काटने का ठिकाना होता है। बहुत सारे लोगों को फुटपाथों पर भी रात काटते देखा जा सकता है। लेकिन यह न्यूनतम जरूरतें भी जब पूर्णबंदी की वजह से नहीं रहीं तो लोगों के पास अपने घर लौट जाने का कोई विकल्प नहीं बचा। हालांकि जब उन्होंने गांव छोड़ा था, तब वहां भी उनके लिए जीवन और गुजारा करना आसान नहीं था। अब शहरों में रोजगार के भरोसे राहत की जिंदगी की जो थोड़ी उम्मीद बंधी थी, उसके बिखर जाने के बाद जब लोग एक बेहद त्रासद हालत में अपने जीवट के बूते मरते-जीते गांव लौट रहे हैं, तब वहां के अभावों से फिर दो-चार होकर ये कैसे गुजारा करेंगे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। स्थिर और नियमित रोजगार के बरक्स व्यक्ति, समाज और सरकार की ओर से मुहैया कराई गई तात्कालिक और अस्थायी सहायता कितने दिनों तक उन्हें राहत देगी, कहना मुश्किल है।