यह आशंका लगातार जताई जा रही थी कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था के कई अहम क्षेत्रों पर कम से कम एक-दो तिमाही तक प्रतिकूल असर पड़ेगा। इस अंदेशे की पुष्टि के संकेत मिलने लगे हैं। हालांकि नवंबर में कोर सेक्टर का प्रदर्शन पिछले साल के इसी माह के मुकाबले अच्छा रहा, पर पिछले महीने के मैन्युफैक्चरिंग के आंकड़े निराशाजनक हैं। कोर सेक्टर में कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, खाद, स्टील, सीमेंट और बिजली शामिल हैं। नवंबर-2015 में कोर सेक्टर में महज 0.6 फीसद का इजाफा हुआ था, जबकि पिछले साल नवंबर में यह आंकड़ा 4.9 फीसद रहा। लेकिन यह आम अनुमान था कि नोटबंदी का असर खासकर छोटे व मझोले उद्योगों पर पड़ेगा। और जैसा कि आंकड़े बताते हैं, वैसा ही हुआ है। पीएमआई (निकेई इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स) दिसंबर में 49.9 रहा। यह पहली बार हुआ कि पीएमआई पचास के नीचे दर्ज हुआ। अगर पीएमआई पचास के ऊपर हो तो आर्थिक गतिविधि बढ़ने और पचास के नीचे तो सिकुड़ने का परिचायक माना जाता है।
अगर माह-दर-माह के आधार पर देखें तो यह मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में 2008 यानी महामंदी के बाद सबसे बड़ी गिरावट है। यह कोई हैरत की बात नहीं है। अचानक नकदी की भारी किल्लत की वजह से बाजार में मांग काफी कम हो गई और इसका सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र पर पड़ा। गौरतलब है कि मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में इसका हिस्सा तीन चौथाई है। इसलिए अंदाजा लगाया जा सकता है कि केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की तरफ से आईआईपी के नए आंकड़े आएंगे तो कैसी तस्वीर उभरेगी। मैन्युफैक्चरिंग आईआईपी का पचहत्तर फीसद हिस्सा होने के साथ ही रोजगार का बड़ा स्रोत है। मैन्युफैक्चरिंग में भारी कमी का नतीजा रोजगार की कमी के रूप में आएगा। हमारी अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र का हिस्सा पचपन फीसद है। ‘निकेइ इंडिया सर्विस बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स’ अक्तूबर में जहां 54.5 था, नवंबर में 40.7 पर आ गया। सरकार को उम्मीद है कि वह नोटबंदी के नतीजों से जल्द ही उबर जाएगी। पर इस उम्मीद की राह में अभी कई अगर-मगर हैं। निजी क्षेत्र में निवेश का उत्साह नहीं दिख रहा, वह अब भी इंतजार करो और देखो की मन:स्थिति में लगता है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को गति मिलने की आस सरकारी खर्चों में बढ़ोतरी से ही लगाई जा रही है। जबकि कच्चे तेल की चढ़ती कीमतों ने सरकार की चिंता पहले ही बढ़ा रखी है।
देश का व्यापार घाटा नवंबर में सोलह महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। भारत अपनी जरूरतों का अस्सी फीसद तेल आयात करता है। कच्चे तेल की कीमतें पिछले साल फरवरी के मुकाबले इस वक्त दुगुनी हो चुकी हैं। इससे जहां आयात का खर्च और फलस्वरूप व्यापार घाटा बढ़ा है, वहीं राहत के कदम उठाने में सरकार के हाथ बंध गए हैं। निर्यात के मोर्चे पर वैसे ही बुरा हाल था। नोटबंदी ने निर्यात क्षेत्र की संभावनाओं को फिलहाल और कुंद किया है, क्योंकि भारत के निर्यात का एक खासा हिस्सा हस्तशिल्प और कारीगरी से ताल्लुक रखता है, और ये व्यवसाय नकदी पर निर्भर रहे हैं। हाल में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का प्रवाह उलटा हो जाने यानी बाहर जाने के क्रम ने सरकार के सामने एक नई चिंता पैदा की है। लिहाजा, पचास दिनों की प्रधानमंत्री की ओर से मांगी गई मियाद पूरी हो जाने के बाद भी अर्थव्यवस्था में उत्साह का संचार होने के फिलहाल कोई संकेत नहीं दिख रहे।

