गुरुवार को हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव की तारीख की घोषणा होते ही विवाद खड़ा हो गया। यह स्वाभाविक भी है। उम्मीद की जा रही थी कि हिमाचल प्रदेश और गुजरात के विधानसभा चुनावों की तारीखें एक साथ घोषित होंगी। लेकिन निर्वाचन आयोग ने हिमाचल के लिए मतदान की तारीख नौ नवंबर तो घोषित कर दी, पर गुजरात की बाबत कहा कि तारीख बाद में घोषित की जाएगी। आयोग के इस फैसले पर जहां कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया जताई है, वहीं पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाइ कुरैशी ने भी हैरानी जाहिर की है। आखिर यह बहुत-से लोगों को खटक क्यों रहा है? इसलिए कि यह नियम और परिपाटी के विरुद्ध है। जिन राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा होने में छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होता, उनके चुनावों की घोषणा आयोग एक साथ करता आया है। जबकि हिमाचल प्रदेश और गुजरात की विधानसभाओं का कार्यकाल पूरा होने में बस दो हफ्ते का अंतर है। आयोग ने हिमाचल के लिए मतगणना यानी नतीजे आने की भी तारीख घोषित कर दी है, अठारह दिसंबर। और इसी के साथ यह भी कहा कि गुजरात में अठारह दिसंबर से पहले ही मतदान का काम पूरा हो जाएगा। गुजरात में भी मतगणना उसी दिन यानी अठारह दिसंबर को ही होगी। यह शायद पहला मौका होगा जब मतदान की तारीख तय किए बगैर ही किसी राज्य में मतगणना की तारीख तय कर दी गई है!

गुजरात में मतदान की तारीख गुरुवार को ही क्यों नहीं घोषित की गई? आयोग ने अपनी ही परिपाटी का पालन इस बार क्यों नहीं किया? कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर के विधानसभा चुनाव हुए थे। इन चुनावों में मतदान की तारीखें एक महीने तक फैली हुई थीं, पर उन सब तारीखों का एलान आयोग ने एक ही बार में किया था, 4 जनवरी को। इस बार क्या हो गया? गुजरात की तारीख अभी घोषित न किए जाने के पीछे आयोग ने जहां 2002-03 के गुजरात चुनाव का उदाहरण दिया है, वहीं यह भी दलील दी है कि गुजरात के लिए तारीख घोषित होते ही यहां भी आचार संहिता लागू हो जाती, जिससे बाढ़-पीड़ितों के लिए चल रहे राहत-कार्य पर बुरा असर पड़ता। ये दोनों तर्क शायद ही किसी के गले उतरें। 2002-03 का उदाहरण नियम तथा परिपाटी का नहीं, बल्कि अपवाद का है। तब गुजरात के चुनाव की तारीखें हिमाचल के साथ इसलिए तय नहीं हो पाई थीं, क्योंकि गुजरात के तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने दंगों के बाद तय समय से पहले ही विधानसभा भंग कर दी थी। इसलिए उस अपवाद के सहारे आयोग अपने ताजा फैसले को सही नहीं ठहरा सकता।

जहां तक बाढ़-पीड़ितों के लिए राहत-कार्य की बात है, इसमें आचार संहिता लागू हो जाने से कोई बाधा क्यों आती? आदर्श चुनावी आचार संहिता मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए की जाने वाली नई घोषणाओं पर रोक लगाती है, ताकि सत्ताधारी पार्टी को सत्ता में होने का बेजा फायदा न मिले। पहले से जारी एक आपातकालीन तथा मानवीय सहायता के काम को जारी रखने पर शायद ही कोई एतराज करे। कांग्रेस का आरोप है कि गुजरात की तारीख फिलहाल इसलिए घोषित नहीं की गई, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोलह अक्टूबर को गुजरात का दौरा करने वाले हैं, और चुनाव के मद््देनजर इस मौके पर वे कई लोकलुभावन घोषणाएं कर सकते हैं। इस आरोप की सच्चाई जो हो, आयोग को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि निष्पक्ष होना ही नहीं, निष्पक्ष दिखना भी जरूरी है, और यही उसकी सबसे बड़ी पूंजी रही है।