उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह सरकारी तंत्र की कार्यशैली में बदलाव के लिए कई अहम पहल की हैं, खासकर भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए जैसी सक्रियता दिख रही है, अगर वह वास्तव में अमल में आती है तो आने वाले दिनों में राज्य का चेहरा बदलने की उम्मीद की जा सकती है। मंगलवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में सभी सरकारी महकमों में ई-टेंडरिंग की व्यवस्था को मंजूरी दी गई। अब राज्य के सभी सरकारी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों, विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, स्वायत्तशासी संस्थाओं आदि में इस व्यवस्था के जरिए निविदा प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसके तहत इन निकायों में एनआईसी के ई-प्रोक्योरमेंट प्लेटफार्म का प्रयोग करते हुए सभी निर्माण कार्यों, सेवाओं, सामग्रियों की खरीद आदि का काम ई-टेंडरिंग यानी इंटरनेट के जरिए मंगाई गई निविदाओं से होगा। इससे टेंडर और ठेकेदारी प्रक्रिया में माफिया राज समाप्त होने की उम्मीद जगी है। इसमें किसी भी व्यक्ति को बिना किसी भय या बाधा के निविदा प्रक्रिया में शामिल होने का मौका मिलेगा।

अब तक लगभग सभी महकमों में किसी काम के लिए निविदा की प्रक्रिया कागज पर ब्योरा पेश कर पूरी की जाती रही है। यह किसी से छिपी बात नहीं है कि इस प्रक्रिया में पहुंच और संपर्कों के बूते कितने बड़े स्तर पर अवैध लाभ उठाए जाते रहे हैं। हालत यह हो गई कि इसी वजह से लगभग सभी संबंधित महकमों में ठेकेदारी के तहत होने वाले कामों में माफिया गिरोहों और उन्हें फायदा पहुंचाने वाले राजनीतिकों के गठजोड़ से होने वाले भ्रष्टाचार का एक पूरा तंत्र कायम हो गया था और तमाम कोशिशों के बावजूद उस पर काबू पाना मुमकिन नहीं हो रहा था। किसी भी निविदा के दौरान बाहुबल का प्रयोग या फिर सरकार या राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं के प्रभाव का इस्तेमाल एक आम रिवायत की तरह कायम हो गया है। इसमें अगर कोई व्यक्ति या संस्थान स्वतंत्र रूप से निविदा में हिस्सा लेना चाहता था तो उसके लिए मौके न के बराबर थे। जाहिर है, इस तरह की व्यवस्था में एक ओर आर्थिक लाभ चंद लोगों तक सिमट कर रह जाता था और उसका सीधा असर संबंधित काम के जमीनी अमल और उसकी गुणवत्ता पर पड़ता था।

ई-गवर्नेंस का प्रयोग अब कोई नई बात नहीं रह गया है और सरकारें चाहतीं तो संबंधित महकमों के कामकाज में इंटरनेट की भूमिका बढ़ा कर उसमें पारदर्शिता सुनिश्चित कर सकती थीं। इसके जरिए भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगाई जा सकती थी। पिछले करीब दो दशकों के दौरान जिन सरकारी विभागों या दूसरे क्षेत्रों में ई-गवर्नेंस या इंटरनेट पर आधारित कामकाज को बढ़ावा दिया गया है, वहां न सिर्फ कामकाज आसान हुआ, उसकी गति बढ़ी, बल्कि भ्रष्टाचार में कमी भी दर्ज की गई। अब योगी सरकार ने अगर भ्रष्ट तंत्र को नियंत्रित करने के लिए उसी का सहारा लेने का फैसला किया है तो यह स्वागतयोग्य है। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह डिजिटल फर्जीवाड़े के अनेक मामले सामने आए हैं, वेबसाइट हैकिंग से लेकर तंत्र में बैठे लोगों की मिलीभगत से आंकड़ों की हेराफेरी की कोशिशें पकड़ में आई हैं, उसे ध्यान में रखते हुए ई-गवर्नेंस को पहले के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित बनाने की भी जरूरत महसूस की जा रही है। इसके अलावा, ई-गवर्नेंस के सुरक्षित और सार्थक उपयोग के लिए इंटरनेट साक्षरता और जागरूकता भी एक बड़ा सवाल है, जिसे आम लोगों के बीच बढ़ावा देने की जरूरत है।