आखिरकार डोनाल्ड ट्रंप ने रिपब्लिकन पार्टी की ओर से अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी हासिल कर ली है। यहां तक पहुंचने के दौरान ट्रंप से संबंधित जितनी बातें सामने आर्इं, उनमें से शायद ही कोई ऐसी थी, जिसे पिछले कुछ दशकों से घोषित तौर पर चली आ रही अमेरिकी नीतियों और लोकतंत्र के अनुरूप कहा जा सकता है। दरअसल, इस साल नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवारी हासिल करने की दौड़ शुरू होने के साथ ही ट्रंप ने जिस तरह आक्रामक अंदाज में अपने दक्षिणपंथी और बेहद संकीर्ण नजरिए की घोषणा करनी शुरू कर दी उसने न सिर्फ अमेरिका में, बल्कि दुनिया भर में लोकतंत्र के समर्थकों को हैरान और निराश किया। दुनिया की महाशक्ति कहे जाने वाले देश के शीर्ष पद की जिम्मेदारी संभालने की लड़ाई लड़ने वाला व्यक्ति अगर कुछ समुदायों के खिलाफ नफरत की भाषा में बात करे तो निश्चित तौर पर इसे लोकतंत्र के खिलाफ ही कहा जाएगा।
इसमें कोई शक नहीं कि आतंकवाद आज दुनिया के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण है। लेकिन उसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान के आधार पर उनके समूचे धार्मिक समुदाय को न सिर्फ शक के कठघरे में खड़ा कर देना, बल्कि उन्हें हाशिये पर डालने के लिए घोषित तौर पर नीतिगत बदलाव की बात करना क्या बताता है? लेकिन इसके अलावा भी ट्रंप की नजर में हर वह समूह या समुदाय दोयम दर्जे का और अमेरिका से बाहर कर देने लायक है, जो उनके संकीर्ण नस्लवादी विचारों के अनुकूल नहीं है। मसलन, अफ्रीकी मूल के अश्वेत लोगों के बारे में ट्रंप ने कहा कि वे आलसी मूर्ख केवल खूब खाते हैं और ठग हैं।
जिस देश में मार्टिन लूथर किंग जैसी शख्सियत के साथ-साथ एक सफल अश्वेत आंदोलन का एक शानदार इतिहास रहा है, वहां फिर से श्वेत प्रभुत्व की लड़ाई लड़ने वालों के समर्थन से एक व्यक्ति अगर इस तरह के विचार के साथ राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार भी बना है तो यह मानवीय मूल्यों में विश्वास रखने वाले दुनिया के तमाम लोगों के लिए अफसोस की बात है। अमेरिका में अपने संघर्ष के बूते महिलाएं आज जहां तक पहुंच सकी हैं, वहां अगर एक शीर्ष पद के उम्मीदवार के ये विचार सुनने पड़े कि जो महिलाएं गर्भपात कराती हैं उन पर जुर्माना लगना चाहिए, तो यह केवल अमेरिकी नहीं, समूची दुनिया की महिलाओं के लिए दुखद है। यही नहीं, ट्रंप ने मैक्सिको के लोगों को सीधे अपराधी, ड्रग्स लाने वाले और बलात्कारी बता कर अमेरिका और मैक्सिको के बीच ‘बहुत बड़ी दीवार’ खड़ी करने की बात कही।
उनकी नजर में अमेरिका में भारतीयों की वजह से नौकरियों की कमी हो गई है और वे भारत के लोगों के साथ-साथ बाकी ‘बाहरियों’ से पैदा होने वाली इस समस्या को खत्म कर देंगे। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि भारत के साथ अमेरिका के संबंध अच्छे रहेंगे। हालांकि ट्रंप के बरक्स डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन उदारवादी राजनीति की हिमायती हैं, लिहाजा अभी यह उम्मीद बाकी है कि अमेरिका अब तक जहां पहुंच सका है, वहां से वह नस्लवादी और संकीर्ण विचारों के राजनीतिक दौर में फिर नहीं लौटेगा। सोचने की बात है कि ट्रंप ने जो विचार अपनी उम्मीदवारी के लिए उत्तेजना फैला कर समर्थन हासिल करने के लिए प्रकट किए, अगर राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उन पर अमल करेंगे, तो अमेरिका और दुनिया की तस्वीर क्या होगी!
