इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि कोई व्यक्ति असाध्य रोग से पीड़ित हो और उसे सामाजिक उपेक्षा और भेदभाव का दंश भी झेलना पड़े। ऐसी स्थिति का सामना करने वाले की बीमारी से जुड़ी तकलीफों के अलावा भावनात्मक पीड़ा का अंदाजा लगाया जा सकता है। एचआइवी और एड्स से संक्रमित व्यक्ति के साथ ऐसी उपेक्षा और भेदभाव भरे बर्ताव की खबरें अक्सर आती हैं। कहीं उन्हें अस्पताल में इलाज करने से इनकार कर दिया गया, तो कहीं स्कूल से निकाल दिया गया या फिर किराए का घर खाली करा लिया गया। जबकि एचआइवी और एड्स से जुड़े सभी तथ्य सामने होने के बावजूद अगर इस रोग से पीड़ित लोगों को भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था, तो उसे रोकने के कानूनी उपायों के अलावा शायद कोई रास्ता नहीं बचा था। पिछली केंद्र सरकार के दौरान ह्यएचआइवी-एड्स बचाव एवं नियंत्रण विधेयक- 2014ह्ण राज्यसभा में पेश किया गया था। अब कुछ संशोधनों के बाद उस विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है। इससे एचआइवी संक्रमित लोगों की तकलीफ कम होने की उम्मीद बनी है। इस कानून के अमल में आने के बाद ऐसे रोगियों के साथ किसी भी तरह के भेदभाव का दोषी पाए जाने पर तीन महीने से लेकर दो साल तक के कारावास की सजा झेलनी होगी और एक लाख रुपए तक का जुर्माना देना पड़ेगा। इस कानून में कई और जरूरी प्रावधान हैं, जिनके तहत अब एचआइवी पीड़ितों को बीमा, रोजगार, शिक्षा आदि किसी भी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।
दरअसल, एचआइवी-एड्स पीड़ितों के साथ भेदभाव या उपेक्षापूर्ण व्यवहार करने वाले लोग यह सामान्य समझ विकसित नहीं कर पा रहे थे कि इस बीमारी के फैलने की प्रक्रिया साथ बैठने, खाने, छूने आदि से नहीं जुड़ी है, बल्कि असुरक्षित यौन-संबंध, आनुवंशिकता, एचआइवी से संक्रमित खून और सुई या किसी औजार का शरीर में प्रवेश इसकी वजहें हैं। लेकिन एक विचित्र धारणा लोगों के मन में बैठी हुई है कि यह जानलेवा रोग छूने तक से हो जाता है। जबकि सिर्फ धारणा से सच नहीं बदल जाता। अव्वल तो एचआइवी के एड्स में तब्दील होने की एक लंबी प्रक्रिया है और इस स्थिति में व्यक्ति बिल्कुल एक सामान्य और स्वस्थ व्यक्ति की तरह जीवन जीता है। उससे किसी को किसी तरह का नुकसान नहीं है। फिर अगर आगे चल कर वह एड्स की चपेट में आता भी है, तो उसकी गतिविधियां और इलाज किसी दूसरी बीमारी के मरीज की तरह ही होती हैं।
मगर हालत यह है कि न केवल समाज के गैरजागरूक लोगों की ओर से, बल्कि कई बार अस्पतालों तक में ऐसे पीड़ितों को भेदभाव और उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। एक समय कुष्ठ और टीबी के मरीजों को भी ऐसे ही भेदभाव का सामना करना पड़ता था। दरअसल, ऐसे व्यवहार में इन बीमारियों के संक्रमण के डर के साथ कई तरह के सामाजिक पूर्वग्रह भी घुल जाते हैं और पीड़ित लोगों की संवेदना पर गहरी चोट करते हैं। बीमारी के बजाय मानसिक आघात की वजह से भी उसकी मृत्यु हो जा सकती है। जबकि किसी भी रोग के मरीज के साथ संवेदनशील और अपनापे का व्यवहार उसके इलाज में बड़ा सहायक पक्ष माना गया है। इसलिए एचआइवी-एड्स रोगी के साथ अगर समाज से लेकर समूचा तंत्र अपने को संवेदनशील बनाए रखे, तो शायद किसी के खिलाफ कानूनी सख्ती की जरूरत नहीं पड़ेगी।
