ऐसा शायद ही कभी हुआ हो जब किसी राज्यसभा चुनाव के दौरान इस कदर खींचतान और तनाव का माहौल देखा गया हो। गुजरात में राज्यसभा की तीन सीटों के चुनाव के दौरान काफी उठापटक के बाद मंगलवार की देर रात जब नतीजों की घोषणा हुई तो उसे मौजूदा राजनीतिक माहौल में एक बड़ी घटना की तरह देखा गया। तीन में से दो सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी अमित शाह और स्मृति ईरानी चुन लिए गए और तमाम आशंकाओं के बीच एक सीट पर कांग्रेस के अहमद पटेल ने जीत दर्ज की। यह चुनाव इसलिए बड़े महत्त्व का साबित हुआ कि इसमें खरीद-फरोख्त के आरोपों के साथ कांग्रेस के दो विधायकों के वोट चुनाव आयोग ने रद्द कर दिए। यही अहमद पटेल की जीत की वजह बना। यह भी साफ हुआ कि चुनाव में कांग्रेस के विधायकों को प्रभावित करने की कोशिशें की गर्इं। अगर ऐसा नहीं था तो फिर दोनों विधायकों को वोट के कागज लहरा कर भाजपा नेताओं को दिखाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके खिलाफ की गई शिकायत को चुनाव आयोग ने गंभीर माना और आखिरकार दोनों वोटों को रद्द कर दिया। कांग्रेस के अहमद पटेल ने लगभग हारी हुई लड़ाई जीत ली।

यों विधानसभा में दो-तिहाई बहुमत होने की वजह से तीन में से दो सीटों का भाजपा की झोली में आना पहले से ही तय था। लेकिन तीसरी सीट भाजपा और कांग्रेस- दोनों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गई थी। यही वजह रही कि इन सीटों के लिए चुनाव का मुद्दा काफी समय से सुर्खियों में था। राजनीति के लिहाज से यह स्वाभाविक ही है कि कोई पार्टी किसी सीट पर अपने उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने की कोशिश करे। लेकिन लोकतंत्र में विश्वास रखने के दावे के साथ कोई पार्टी किसी दूसरे दल से देश को मुक्त करने की बात करती है तो इस पर सवाल उठना लाजिमी है। सच यह है कि इस समूचे चुनाव के दौरान एक-एक विधायकों के वोट हासिल करने के लिए जिस तरह की कवायदें देखी गर्इं, राजनीतिक गलियारों से विधायकों को प्रभावित करने या धमकी देने के अलावा खरीद-फरोख्त के तीखे आरोप सामने आए, उससे समूची लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा है। हालत यह थी कि कांग्रेस को अपने विधायकों को लेकर राज्य से बाहर जाना पड़ा, ताकि उन्हें किसी प्रलोभन से दूर रखा जा सके।

लेकिन तमाम जद्दोजहद के बाद जिस तरह के नतीजे आए, वह कांग्रेस के लिए राहत की बात इसलिए है कि इसके सहारे वह गुजरात में फिर से अपनी जमीन हासिल करने की दिशा में बढ़ सकती है। गुजरात में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं और कई वजहों से भाजपा वहां बचाव की मुद्रा में है। ऐसे में राज्यसभा सीट पर अहमद पटेल की जीत कांग्रेस के मनोबल को बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है। गुजरात के कद्दावर नेता शंकर सिंह वाघेला के इस्तीफे के बाद कांग्रेस में जो निराशा का माहौल पैदा हुआ था, उसे पीछे छोड़ कर पार्टी अब आगे की ओर देख सकती है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा में सरकार बनाने के बाद बिहार में महागठबंधन को तोड़ कर नीतीश कुमार के साथ भाजपा ने जिस तरह वहां की सत्ता हासिल की, उससे उसका मनोबल पहले ही काफी मजबूत है। लेकिन अगर वर्चस्व कायम करने के मकसद से अपनी राजनीति को जनता के सामने रखने के बजाय जोड़-तोड़ कर सत्ता हासिल करने के लिए नैतिकता के तमाम तकाजों को ताक पर रख दिया जाएगा तो उसे लोकतंत्र की किस परिभाषा के तहत देखा जाएगा!