हमारे देश में अदालतों पर मुकदमों का जैसा बोझ है वैसा दुनिया में और कहीं नहीं है। कुल लंबित मामलों की तादाद तीन करोड़ से ऊपर पहुंच चुकी है, जिनमें से दो करोड़ से ज्यादा मामले निचली अदालतों में फैसलों का इंतजार कर रहे हैं। निचली अदालतों में लंबित मामलों में दो तिहाई आपराधिक मामले हैं और ऐसे दस में से एक मामला दस साल से ज्यादा समय से लंबित है। निचली अदालतें जिस कछुआ चाल से चलती हैं वह सबको मालूम है। अगर इसी रफ्तार से मुकदमों का निस्तारण हो, तो सिविल मामलों का पूरा निपटारा शायद ही कभी संभव हो पाए। और कोई नया मुकदमा दायर न होने की सूरत में भी, सारे आपराधिक मामले निपटाने में कम से कम तीस साल लगेंगे।
मुकदमों का पहाड़ खड़ा हो जाने के पीछे जजों की कमी समेत कई कारण गिनाए जा सकते हैं। भारत में आबादी के अनुपात में जजों की तादाद बहुत कम है। यहां तिहत्तर हजार की आबादी पर एक जज है, जबकि अमेरिका में यह अनुपात सात गुना ज्यादा है। जजों की संख्या बढ़ाने की कौन कहे, जजों के सारे स्वीकृत पद भी समय से नहीं भरे जा पाते। लेकिन मुकदमों के भारी बोझ के पीछे और एक वजह है, वह यह कि बहुत सारे मामले स्वयं सरकार के रवैए की देन हैं।
खुद कानूनमंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि छियालीस फीसद लंबित मामलों में सरकार पक्षकार है। यह तथ्य बताने के साथ ही उन्होंने एक बहुत जरूरी पहल की है। अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को पत्र लिख कर उन्होंने कहा है कि सरकार जबरन वादी होना बंद करे; न्यायपालिका का समय सबसे ज्यादा उन मामलों में जाता है जिनमें सरकार पक्षकार है। उचित ही उन्होंने यह हिदायत दी है कि अधिकारियों को व्यर्थ व छोटे-मोटे मामलों की पहचान कर उनकी छंटनी कर लेनी चाहिए तथा उन्हें वापस लेने या शीघ्रता से निस्तारण करने के लिए कदम उठाना चाहिए। कानूनमंत्री से पहले, प्रधानमंत्री भी सरकार के सबसे बड़ी मुकदमेबाज होने पर चिंता जता चुके हैं।
पिछले साल अक्तूबर में मोदी ने कहा था कि अगर कोई शिक्षक अपनी नौकरी से जुड़े मामले में अदालत की शरण में जाता है और फैसला उसके पक्ष में होता है, तो उस फैसले को मानक मान कर हजारों अन्य लोगों को वैसे ही लाभ दिए जाने चाहिए, ताकि मुकदमों का बोझ घटाया जा सके। लेकिन होता यह रहा है कि बहुत सारे मामलों में सरकार निहायत अनावश्यक होने पर भी अपील दायर कर देती है। इसके अलावा, बहुत-से सरकारी महकमे अंतर्विभागीय विवादों को आपस में सुलझाने के बजाय अदालत में पहुंच जाते हैं। अच्छी बात है कि सरकार के बेवजह पक्षकार बनने की व्यर्थता का अहसास हमारे नीति नियंताओं में बढ़ रहा है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे मुकदमों की तादाद घटेगी। पर यह भी गौरतलब है कि बहुत-से गैर-जरूरी मुकदमे असहमति तथा विरोध की आवाज कुचलने के इरादे की देन होते हैं। सरकार क्या इस मामले में भी संयम का परिचय देगी? मुकदमों का बोझ तेजी से घटाने के लिए भी प्रशासनिक सुधार एक अहम तकाजा है। प्रशासन से न्याय न मिल पाने की ढेर सारी शिकायतें बाद में अदालत पहुंच जाती हैं पहले मुकदमे का रूप ले लेती हैं। अगर प्रशासनिक तंत्र अपने कर्मियों तथा लोक शिकायतों के प्रति पर्याप्त संवेदनशील व जवाबदेह हो, तो बहुत सारे मुकदमे पैदा ही नहीं होंगे। कुछ कानूनी सुधार भी जरूरी है। मसलन, जमीन का रिकार्ड दुरुस्त करके और किरायेदारी संबंधी कानून की विसंगतियों को दूर कर एक झटके में बहुत सारे मुकदमों की जड़ काटी जा सकती है। इसी तरह विचाराधीन कैदियों के मामलों की समीक्षा करके भी मुकदमे तीव्रता से कम किए जा सकते हैं।

