जर्मनी के आम चुनाव के नतीजे एक मायने में अनुमान के अनुरूप आए हैं, तो एक हद तक चौंकाने वाले भी कहे जा सकते हैं। चांसलर एंजेला मर्केल की पार्टी सीडीयू (क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी) और उसकी सहयोगी पार्टी सीएसयू (क्रिश्चियन सोशल यूनियन) के गठबंधन की जीत या बढ़त तय मानी जा रही थी। परिणाम भी वैसा ही आया। इस तरह कहा जा सकता है कि मर्केल की लोकप्रियता बरकरार है। लेकिन गौरतलब है कि सीडीयू और सीएसयू के गठबंधन को तैंतीस फीसद वोट ही मिल पाए, जो कि दशकों में उसका सबसे कम मत-प्रतिशत है। यही हाल सीडीयू की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पार्टी सोशल डेमोक्रैट (एसपीडी) का भी हुआ, जिसे सिर्फ 20.5 फीसद वोट मिले, जो कि कई दशकों में उसका सबसे खराब प्रदर्शन है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से जर्मनी में जितने भी चुनाव हुए, उनमें सीडीयू और एसपीडी यही दोनों पार्टियां छाई रही हैं। लेकिन ताजा चुनाव नतीजों को देखें, तो करीब छियालीस फीसद मतदाताओं ने अन्य दलों को वोट देना पसंद किया। और भी उल्लेखनीय बात यह है कि धुर दक्षिणपंथी एएफडी को तेरह फीसद वोट मिले हैं, और इसी के साथ वह जर्मनी की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी है
एंजेला मर्केल को चौथा कार्यकाल मिलना तय है। पर उनकी राह अब पहले से कठिन होगी। सरकार के गठन के लिए उन्हें एक ऐसे गठबंधन का सहारा लेना पड़ेगा जिसे संभालना और चलाना आसान नहीं होगा। एसपीडी ने सरकार के साथ या गठबंधन में शामिल होने के बजाय विपक्ष में बैठने का इरादा जताया है। ऐसे में मर्केल को दो तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना होगा। एक तरफ उन्हें कॉरपोरेट हितैषी समझे जाने वाले फ्री डेमोक्रैट (एफडीपी) का समर्थन लेना होगा, तो दूसरी तरफ ग्रीन्स पार्टी का। एफडीपी को दस फीसद वोट मिले हैं और ग्रीन्स को नौ फीसद। ब्रेक्जिट के नतीजे और अमेरिका की कमान डोनाल्ड ट्रंप के हाथ में आने से यूरोपीय संघ के तमाम नेता असहज महसूस करते रहे हैं। इसलिए भी मर्केल को लेकर जर्मनी ही नहीं, सारे यूरोप में एक उम्मीद का भाव रहा है। और यह भी एक बड़ी वजह थी कि जर्मनी के संसदीय चुनावों को बड़ी दिलचस्पी से देखा जा रहा था। मर्केल को फिर एक कार्यकाल मिलने से यूरोपीय संघ ने राहत की सांस ली है। पर आप्रवासी-विरोधी धुर दक्षिणपंथी एएफडी, जो पिछले चुनाव में एकदम हाशिये पर थी, उसके तीसरे स्थान पर आने से यूरोप के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं। एएफडी को पूरब में ज्यादा सफलता मिली। पूर्वी प्रांतों से समर्थन जुटाने के अलावा उसने उन लोगों की भावनाओं को भी भुनाया जो शरणार्थियों की बाबत मर्केल की नीति और सत्ता-प्रतिष्ठान से नाराज थे।
एफडी के पास संसद में बोलने के मौके और साथ ही सरकारी संसाधन भी होंगे, और इन सबका इस्तेमाल वह अपने जहरीले प्रचार अभियान के लिए कर सकती है। इसलिए कुछ लोगों को उस अतीत का भूत सताने लगा है जब जर्मनी उग्र राष्ट्रवाद के आवेश में अंधी सुरंग में पहुंच गया था। पर शायद इतना भयभीत होने की भी जरूरत नहीं है। एएफडी सरकार में नहीं होगी। यही नहीं, विपक्ष में वह अलग-थलग होगी, क्योंकि सारी पार्टियों ने उससे दूर रहने के ही संकेत दिए हैं। लेकिन सवाल है कि उन लोगों का भरोसा फिर से कैसे अर्जित किया जाएगा जो इस बार एएफडी के पाले में चले गए। एंजेला मर्केल और उनके गठबंधन ने स्थिरता और निरंतरता के
