तमिलनाडु में एक पारंपरिक खेल जल्लीकट्टू के मसले पर पिछले दिनों काफी विवाद हुआ था और इसमें पशुओं के प्रति व्यवहार से लेकर हिस्सा लेने वाले लोगों की जान के जोखिम पर सवाल उठाए गए थे। लेकिन लगता है कि इस मुद्दे पर हुई बहस का कोई खास असर नहीं पड़ा है। रविवार को एक बार फिर तमिलनाडु के पुदुकोत्तई जिले के तिरुवापुर में सांड़ों को नियंत्रित करने के इस खेल के दौरान एक प्रतिभागी सहित दो लोगों की मौत हो गई और छप्पन अन्य घायल हो गए। संभव है कि लंबे समय से चली आ रही इस परंपरा के चलते लोगों के लिए यह खेल एक भावनात्मक सवाल बन चुका हो। लेकिन महज किसी उत्सव के पारंपरिक पक्ष के प्रति भावुक होकर इसमें शामिल लोगों की जान तक जाने के खतरे की भी अनदेखी करना कितना उचित है! गौरतलब है कि जल्लीकट्टू खेल में सांड़ों को काबू करने की पूरी प्रक्रिया को पशुओं के प्रति क्रूरता बता कर कुछ संगठन इस पर पाबंदी लगाने की मांग करते रहे हैं। इसी के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया था।
लेकिन अदालत के फैसले पर अमल के बजाय तमिलनाडु में इसका तीखा विरोध शुरू हो गया था। इससे उपजे दबाव के बाद हालत यह हो गई कि राज्य सरकार न सिर्फ इसे जारी रखने के लिए अध्यादेश लाई, बल्कि मौजूदा कानून में बदलाव करके ‘पशु क्रूरता निवारण (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम, 2017’ पारित किया गया। उसके बाद जल्लीकट्टू के सामने खड़ी कानूनी अड़चन दूर हो गई। लेकिन सच यह है कि इस खेल में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों से लेकर सामान्य दर्शकों के भी घायल होने या मारे जाने का जोखिम बना रहता है। इसकी वजह इस खेल की प्रकृति में भी छिपी है, जिसमें बेहद ताकतवर सांड़ों को मैदान में उतार कर उन्हें काबू में करने की प्रतियोगिता होती है। खेल के नाम पर इसमें दोनों तरफ एक तरह की आक्रामकता होती है, जिसमें सांड़ बचने और भागने की कोशिश करता है और इसके खिलाड़ी उसे पकड़ने और नियंत्रित करने की। ऐसी स्थिति में यह खेल कम और उत्तेजना का उत्सव ज्यादा हो जाता है। दरअसल, जब किसी परंपरा से जुड़ी भावना आस्था में तब्दील हो जाती है तो उस पर विचार की गुंजाइश कम हो जाती है।
यह सही है कि तमिल नव वर्ष के मौके पर मनाए जाने वाले पोंगल के दौरान जल्लीकट्टू को तमिलनाडु की संस्कृति का हिस्सा माना जाता है और तकरीबन दो हजार साल पुराने तमिल संगम साहित्य में भी जल्लीकट्टू का वर्णन मिलता है। मगर इसका एक सामाजिक पहलू यह भी है कि समय के साथ इसके बदलते स्वरूप में जल्लीकट्टू को जातिगत वर्चस्व के एक आयोजन के रूप में देखा जाने लगा। समाज के दलित-वंचित तबकों को इस खेल में हिस्सा नहीं लेने देने और इस सवाल पर हिंसा होने की भी खबरें आती रही हैं। तो जरूरत इस बात की है कि कोई सामाजिक त्योहार अपने व्यापक स्वरूप में ऐसा हो जिसमें सभी तबकों को हिस्सा लेने का मौका मिले। इसके अलावा, किसी भी त्योहार में अगर जोखिम और संवेदनहीनता से बचा जाए तो उसकी अहमियत बढ़ जाती है। मनोरंजन, परंपरा और संस्कृति के नाम पर किसी पशु के प्रति संवेदनहीनता को अगर एक बार किनारे कर भी दिया जाए तो इसमें जिस तरह अक्सर लोगों की जान जाने की खबरें आती हैं, उसे कैसे सिर्फ कोई हादसा माना जा सकता है?
पारंपरिक उत्सव या फिर जोखिम का खेल
तमिलनाडु में एक पारंपरिक खेल जल्लीकट्टू के मसले पर पिछले दिनों काफी विवाद हुआ था और इसमें पशुओं के प्रति व्यवहार से लेकर हिस्सा लेने वाले लोगों की जान के जोखिम पर सवाल उठाए गए थे।
Written by जनसत्ता
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First published on: 07-03-2017 at 06:08 IST