वह मियाद पूरी हो गई, जो प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के बाद पैदा हुए हालात को सामान्य बनाने के लिए मांगी थी। लेकिन हालात सामान्य हो पाए हैं, यह दावा नहीं किया जा सकता। यह सही है कि अब बैंक शाखाओं और एटीएम के बाहर वैसी भीड़ नहीं है जैसी कुछ दिन पहले तक दिखती थी। पर नगदी की किल्लत अब भी जारी है और लोग इसका दंश महसूस कर रहे हैं। पांच सौ और हजार के नोटों के विमुद्रीकरण की घोषणा प्रधानमंत्री ने ऐसे वक्त की, जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की गहमागहमी शुरू हो चुकी थी। इसलिए इस घोषणा को संभावित सियासी नफा-नुकसान से भी जोड़ कर देखा गया। फिर, जिस तरह संसद का शीतकालीन सत्र ठप रहा, प्रधानमंत्री विपक्ष को काले धन के बचाव में खड़ा चित्रित करते रहे, और विपक्ष नोटबंदी को एक घोटाला और सरकार को लोगों की परेशानियों के प्रति संवेदनहीन बताता रहा, उससे नोटबंदी के एक बड़ा राजनीतिक मुद््दा बनने में कोई कसर बाकी न रही। एक दूसरे को घेरने का यह क्रम अभी जारी रहेगा। सवाल है कि नोटबंदी का आकलन किस तरह से किया जाएगा? सत्तापक्ष यह कहते नहीं थकता कि आम लोग प्रधानमंत्री के इस कदम की सराहना कर रहे हैं। इसदावे को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। पर वह नोटबंदी के पीछे बताए गए उद्देश्य का समर्थन है, न कि क्रियान्वयन के तौर-तरीकों का। समर्थन करने वालों में भी बहुत-से लोग मानते हैं कि सरकार की तैयारी मुकम्मल नहीं थी।
फिर, सवाल यह भी है कि क्या नोटबंदी का आकलन राजनीतिक उद्यम और कौशल से बनाई गई जन-धारणा या चुनावी नतीजे के आधार पर होगा, या अर्थव्यवस्था पर उसके वास्तविक असर को ध्यान में रख कर? बहुत सारे अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि नोटबंदी से देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। सारी रेटिंग एजेंसियों ने भी इसी तरह की राय जाहिर की है। जमीनी हालात इसकी पुष्टि करते दिखते हैं। चलन में रही देश की कुल मुद्रा के छियासी फीसद मूल्य के बराबर नोटों के अमान्य हो जाने से मझले व छोटे उद्योगों समेत समूचे असंगठित क्षेत्र का जो हाल हुआ वह किसी से छिपा नहीं है। देश के नब्बे फीसद से ज्यादा लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इसलिए समझा जा सकता है कि नोटबंदी ने आर्थिक कामकाज और आजीविका को किस हद तक प्रभावित किया। एक दिन की भी बैंक हड़ताल हो, तो हजार-दो हजार करोड़ के नुकसान का अंदाजा आ जाता है। जब महीने-सवा महीने से बैंकों का कारोबारी काम ठप रहा हो, तो सब मानते हैं कि बैंकों को अपूर्व नुकसान हुआ होगा। अलबत्ता इस सब से देश की अर्थव्यवस्था को उबरने में कितना वक्त लगेगा, इस पर राय अलग-अलग हो सकती है।
प्रधानमंत्री की इच्छा के मुताबिक उनके मंत्री नोटबंदी के फायदे गिनाने में जुट गए हैं। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने नोटबंदी के बाद अप्रत्यक्ष कर संग्रह में भारी वृद्धि का हवाला दिया है, वहीं कृषिमंत्री राधामोहन सिंह ने कहा है कि नोटबंदी से कृषि पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। न वे सौ से ज्यादा लोगों की मौत का जिक्र करते हैं न लोगों की तमाम परेशानियों और असंगठित क्षेत्र के काम-धंधों के खस्ताहाल हो जाने की दास्तान सुनने को तैयार हैं। जाहिर है, सरकार को केवल उन बातों से मतलब है जिनसे नोटबंदी का महिमागान किया जा सके। नोटबंदी के फायदे गिनाने के साथ ही सरकार कैशलेस मुहिम में भी जुटी हुई है। प्रधानमंत्री के आठ नवंबर के संबोधन में एक बार भी कैशलेस का जिक्र नहीं आया था, पर अब लगता है यही सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता है, प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ से लेकर उनके भाषणों और सरकार के विज्ञापनों में कैशलेस की धुन छाई हुई है। लेकिन इसके जरिए क्या प्रधानमंत्री पचास दिनों में हालात सामान्य हो जाने के अपने वादे से पल्ला झाड़ सकते हैं?

