तेजाब से हमले की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इससे केवल शारीरिक पीड़ा ही नहीं, बल्कि गहरा मानसिक और भावनात्मक आघात भी पहुंचता है। कई बार पीड़ित महिलाओं को अवसाद और सामाजिक अलगाव का सामना भी करना पड़ता है, जो उनके लिए जिंदगी भर का दर्द बन जाता है। सवाल है कि इस तरह के हमलों पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? साथ ही पीड़ित महिलाओं को समय पर न्याय मिल रहा है या नहीं, उनके पुनर्वास के लिए सरकारी योजनाओं की स्थिति क्या है और पीड़ितों को उनका लाभ मिल पा रहा है या नहीं? ये ऐसे सवाल हैं, जिनको लेकर सर्वोच्च न्यायालय भी चिंतित है।

यही वजह है कि मंगलवार को शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से तेजाब हमलों से संबंधित मामलों का वर्ष वार ब्योरा, अदालतों में उनकी स्थिति तथा पीड़ितों की मदद के लिए पुनर्वास उपायों का विस्तृत विवरण देने को कहा है। साथ ही केंद्र सरकार से संबंधित कानून में बदलाव पर विचार करने को भी कहा है, ताकि दोषियों को कड़ी सजा मिल सके।

गौरतलब है कि सर्वाेच्च न्यायालय ने वर्ष 2013 में खुले बाजार में तेजाब की बिक्री पर रोक लगा दी थी। इसके बाद तेजाब से हमले की घटनाओं में थोड़ी कमी देखी गई, मगर पिछले कुछ वर्षों से यह आंकड़ा फिर बढ़ने लगा है। राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो की एक रपट के मुताबिक, वर्ष 2017 में तेजाब हमलों के 244 मामले दर्ज हुए थे, जबकि वर्ष 2021 में ऐसे 176 मामले सामने आए। वर्ष 2023 में यह आंकड़ा बढ़कर 207 हो गया।

ऐसे में यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि जब खुले बाजार में तेजाब की बिक्री पर रोक है, तो फिर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की इस तक पहुंच कैसे संभव हो पा रही है। जाहिर है, कुछ लोग अवैध तरीके से तेजाब की बिक्री करते हैं और सरकारी तंत्र की अनदेखी का दंश कई महिलाओं को झेलना पड़ता है। यह बात भी छिपी नहीं है कि तेजाब हमले के पीड़ितों एवं उनके परिजनों को कई बार न्याय के लिए वर्षों तक अदालत के चक्कर काटने पड़ते हैं और उनके पुनर्वास की सरकारी योजनाएं भी कागजों तक ही सीमित रह जाती है।