अनीता हमारे परिचित के घर बचपन से काम कर रही है। वह हमारे घर भी काम करती है। उसे पीलिया हो गया था, जिसकी वजह से उसे छुट्टी लेनी पड़ी। हालांकि इसके बावजूद वह कई दिनों तक काम पर आती रही। इससे पहले उसे चेचक हुआ था तो दो दिन छुट्टी के बाद वह काम पर लौट आई।

हमने उसे मना किया और कहा कि जब पूरी तरह ठीक हो जाए, तब आना। पहले उसे लगा कि शायद हम छूत की वजह से उसे मना कर रहे हैं। मैंने उसे समझाया कि हम वाकई चाहते हैं कि वह आराम करे। लेकिन वह आराम कहां से करती! हमारे छुट्टी देने के बावजूद उसे दूसरे घर में काम करने जाना ही था। आराम नहीं कर पाने की वजह से उसे पीलिया हो गया। अब छुट्टी पर जाना उसकी मजबूरी हो गई थी।

हमारे परिचित के साथ रहने वाली उनकी बेटी और नाती को यह बात काफी दिक्कत दे रही थी, क्योंकि यह परिवार अपने हाथ से एक ग्लास पानी लेने की जहमत भी नहीं उठाता। हमारे वे परिचित इसी से परेशान थे। उन्होंने अनीता के बारे में मुझसे कहा- ‘बेटा एक बात कहूं! ‘छोटी जात’ मचाए उत्पात! हम खाना नहीं खा पा रहे हैं, घर पूरा गंदा पड़ा है, बर्तन भी नहीं धुल पाते हैं…!’ ऐसी कई तकलीफों को बयान करते हुए उन्हें इस बात का खयाल एक बार भी नहीं आया कि जो लड़की उनके घर में बचपन से काम कर रही है, वह किस तकलीफ से गुजर रही है।

बीस सालों से अगर आप किसी के भी साथ, कैसे भी जुड़े रहे हों, तो एक रिश्ता कायम हो ही जाता है। इससे कम वक्त में तो हमें किसी अनजान से भी प्यार हो जाता है। तो क्या अनीता का अस्तित्व उनके लिए इतना भी नहीं है? उनके लिए अनीता वह है, जिसे काम के एवज में पैसे मिलते हैं। उसे इस बात का हक नहीं है कि बीमार पड़ सके। उसे इस बात का भी हक नहीं है कि एक दिन के लिए भी अपने बच्चे को घुमाने के लिए छुट्टी ले सके। अगर वह ऐसा करेगी तो उसके ‘मालिकों’ को अपने शरीर को काम करने के लिए तकलीफ देनी पड़ जाएगी। यह उनका काम नहीं है, क्योंकि ‘छोटे काम’ कुछ खास जातियों और तबकों के लिए ही निर्धारित कर दिए गए हैं! जब भी उसके मन में अपने मालिक के प्रति कोई अपनत्व के भाव वाली गलतफहमी उमड़ेगी तो ऐसी बातें उसे याद दिला दी जाती हैं कि उसकी हैसियत एक नौकरानी की ही रहेगी।

कुछ समय पहले झारखंड से आई एक बच्ची के साथ उसकी मकान मालिक की ज्यादती की खबर सुर्खियों में आई थी। उसके कुछ दिनों बाद एक राष्ट्रीय पार्टी के सांसद और उनकी पत्नी द्वारा अपनी घरेलू सहायिका की प्रताड़ना का किस्सा सामने आया। पिछले साल एक डॉक्टर दंपति झारखंड से ही आई एक बच्ची को घर में बंद करके विदेश छुट्टी मनाने चले गए थे। सिर्फ तेरह साल की वह बच्ची भूखे-प्यासे घर में तड़पती रही। बाद में किसी एनजीओ की मदद से उसे बाहर निकाला गया। वह बच्ची तो बाहर निकाल ली गई, लेकिन मालिक बनने का ख्वाहिशमंद और गुलामपंसद तबका इस मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है। यों भी काम के बदले में मेहनताना देने वाला खुद को मालिक ही समझता है। वह मान कर चलता है कि नौकर के रूप में उसने एक गुलाम खरीदा है। वह बीमार नहीं पड़ेगा, उसे भूख नहीं लगेगी, उसे छुट्टी नहीं मिलेगी, उसे अपने परिवार के लिए वक्त निकालने का अधिकार नहीं है!

कभी पूरे विश्व में चौराहों पर गुलामों की खरीद-बिक्री होती थी। उनकी बोलियां आलू-प्याज की तरह लगती थीं। धीरे-धीरे हम जागरूक हो गए और चौराहों पर बिकने वाले गुलाम अब ‘होम डिलीवरी’ के इस युग में एजेंसी के माध्यम से सीधे घर पर पहुंचाए जाने लगे हैं। इसके अलावा, अनीता जैसी लड़कियां भी हैं जो अपने परिवार और बच्चों के सुखद भविष्य का सपना लिए किसी के जूठे बर्तन, मैले कपड़े, गंदे फर्श को अपनी मेहनत और ईमानदारी से चमकाती हैं। वह अपने मालिक के दामाद की तबियत बिगड़ने पर अपना घर-परिवार भूल कर उसकी सेवादारी करती है। लेकिन जब वही अनीता कुछ दिनों बाद अपने बच्चों के लिए एक दिन की छुट्टी लेती है तो उसी घर में से यह आवाज आती है कि ‘छुट्टी क्यों ली? अपने लड़के को प्राइम मिनिस्टर बनाएगी क्या…?’ गोया गरीब के बच्चे को पढ़ने-लिखने का अधिकार नहीं है, क्योंकि वे पढ़-लिख गए तो सेवक कहां से मिलेंगे! इसलिए ‘छोटी जात’ का छुट्टी पर जाना, यानी ‘उत्पात’ मचाना!

पंकज रामेंदु

 

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