मौसमी बुखार को ‘वायरल’ भी कहते हैं। यानी ऐसा बुखार, जिसके एक से दूसरे व्यक्ति में फैलने का डर रहता है। मगर अब भाषण भी ‘वायरल’ यानी संक्रमणशील होने लगे हैं। दरअसल, आजकल ‘वायरल’ होने का मतलब किसी बयान, वाकया या वस्तुस्थिति का एक से अनेक के बीच में तेजी से फैलना भी हो चुका है। सोशल मीडिया में अगर कोई वीडियो बहुचर्चित हो जाए तो कहा जाता है कि वह ‘वायरल’ हो गई। इसी तर्ज पर कहें तो संयुक्त राष्ट्र में लंबे समय तक कार्यरत रहे कांग्रेस के नेता शशि थरूर का लंदन के आॅक्सफर्ड विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के बीच हुआ भाषण ‘वायरल’ हो गया। या यों कहें कि दुनिया भर के भारतीय लोगों ने उसे देख कर ‘वायरल’ बना दिया है। नए परिंदे अपने नए परों की उड़ान को ही ऐतिहासिक मान बैठते हैं।
बेशक इतिहास दोहराया जाता होगा। लेकिन उसकी सार्थकता, उसका समय और माध्यम बदलता है। शशि थरूर को संयुक्त राष्ट्र के कार्यकाल के कारण विश्व राजनीति, उसके इतिहास और मार्गदर्शकों के बारे में जानकारी होगी। उन्हें मोहनदास करमचंद गांधी की भी याद होगी। लेकिन थरूर की लंदन में खास लहजे में ब्रिटेन को लगाई गई फटकार को आज हर तरफ वाहवाही मिल रही है। गांधीजी ने भी एक शताब्दी पहले इन्हीं मुद्दों को ‘हिंद स्वराज’ में लिखा था। सन 1909 में लिखी छोटी-सी पुस्तक को ब्रितानी हुकूमत ने दफनाने की कोशिश की थी।
बहरहाल, ‘ऑक्सफर्ड यूनियन सोसाइटी’ के ‘लोग, जो हमारी दुनिया संवारते हैं’ के तहत आयोजित बहस में सवाल था कि क्या ब्रिटेन को अपने अधीन रहे देशों को मुआवजा देना चाहिए! अपने देश और दुनिया भर में ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि ब्रिटेन ने ‘कॉलोनी’ यानी उपनिवेश बना कर उन देशों का उद्धार किया। वे यह भी मानते हैं कि भारत में अंगरेजों ने रेलवे, अंगरेजी, अदालत और कानून, डॉक्टर और प्रशासनिक सेवक लाकर और संविधान के जरिए विकास कार्य किए, जिससे उन देशों में बेहतर समाज बना। इस गलतफहमी का जिस गांधी ने मुंहतोड़ जवाब दिया था, उसे ही आजाद भारत की सरकारों ने नकार दिया। गांधीजी के लिए स्वराज से बड़ी कोई आजादी नहीं थी। आज उन्हीं बातों को भाषण में कहने वाले थरूर को कंधों पर बिठाया जा रहा है।
भारत की आर्थिक स्थिति और व्यवस्था अंग्रेजों के आने से पहले सुदृढ़ थी, भारत ‘सोने की चिड़िया’ था, यह नई पीढ़ी को थरूर ने बताया। वे कांग्रेस के राज में सत्ता सुख प्राप्त करते रहे और वही करते रहे, जिन कारणों से कांग्रेस ने साठ सालों तक देश को ‘कॉलोनी’ बना कर रखा था। गांधी के सपनों का भारत विदेशी आधिपत्य के बीच सड़ता रहा। कुछ लोग तो अमीर हुए, लेकिन भारत गरीब ही रहा। फिर भी थरूर का भाषण इतिहास को नए परिप्रेक्ष्य में देखने और नए परिंदों को जागरूक करने के लिए जरूरी था। उनके भाषण से युवाओं को गांधीजी का माना, लिखा और कहा याद आया। दो सौ साल तक भारत ब्रिटेन का उपनिवेश रहा। जो सभ्यता ब्रिटेन छोड़ कर गया, वह भारत के लिए सही थी या नहीं, इस पर क्यों अध्ययन नहीं हुए हैं?
थरूर ने अंगरेजों के आने से पहले और जाने के बाद के भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी की। आॅक्सफर्ड में उनका भाषण गांधी विचार से प्रेरित था। गांधी के विचारों को दोहराने के लिए थरूर का भाषण सराहनीय है। सवाल उठता है कि थरूर अगर इन विचारों से सहमत थे तो सरकार में रहते हुए इनका आकलन उनने क्यों नहीं किया? क्यों सरकारें देश में सिर्फ ‘कॉलोनी’ का ही विस्तार करती रही हैं?
देश में भाजपा की सरकार है। प्रधानमंत्री अपनी हर उद्घोषणा में गांधीजी का आह्वान करते आ रहे हैं। कांग्रेस द्वारा गांधी के नाम पर वोट मांगने की सफल शैली को मोदी ने नए माहौल में इस्तेमाल किया। गांधी की प्रासंगिकता की चर्चा से युवाओं पर असर जरूर पड़ा। लेकिन गांधी-जीवन के संदेश को कामकाज और व्यवहार में लाने की कवायद नहीं दिखती है। आज राजनीति में सने वकील देश चलाने में लगे हैं। अस्पताल पांच सितारा होटल हो गए हैं, आर्थिक असमानता गहरी होती गई है। सवाल है कि शशि थरूर को आॅक्सफर्ड में उठे सवालों के जवाब में गांधीजी ही क्यों याद आए? नरेंद्र मोदी देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद गांधी के नाम पर आह्वान करते हैं! जब वाहवाही लूटनी हो या फिर सत्ता के लिए देश की आशा जगानी हो तो गांधी-विचार ही रामबाण लगते हैं। फिर विचारों को अमल में लाने की साफगोई क्यों नहीं होनी चाहिए? ‘हिंद स्वराज’ पर फिर से बहस क्यों नहीं हो?
संदीप जोशी
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