प्रतिभा कटियार
विद्यालय यानी इंसानियत के पाठ पढ़ने, व्यक्तित्व के खुलने और खिलने की जगह… शरारतों की आजादी, पढ़ने-लिखने के प्रति प्रेम पनपने की जगह। उत्तराखंड में ऊधमसिंह नगर के प्राथमिक विद्यालय, बाजपुर- दो में डोरीलालजी बतौर प्रधानाध्यापक कार्यरत हैं। यह स्कूल उनके प्रयासों के लिए जाना जाता है। वे कुर्सियां जमाते हैं, बिखरे हुए कुछ कागज उठा कर कूड़ेदान में डालते हैं और कुछ बच्चों से कहते हैं कि उनके जो साथी चुपचाप बैठे हैं, उन्हें भी बातचीत में शामिल करो। कक्षा में खास अनुशासन नहीं दिखता, लेकिन सुशासन या स्वशासन दिखता है। बच्चे निर्भय, मस्ती से भरे हुए, किताबों में लिखे हुए से खेलते-सीखते हुए…!
डोरीलालजी बताते हैं कि मैं पढ़ने में कोई बहुत तेज नहीं था। संकोची था, शर्मीला, चुपचाप रहने वाला। लेकिन मेरे शिक्षक ने मुझे मेरी चुप्पी में पढ़ा। एक शिक्षक जब खुद को बांटता है तो कितनों में बंटता है! मुझे लगता है, मैं आज जो कुछ भी हूं, जैसा भी हूं अपने गुरु राम प्रकाशजी की वजह से हूं। और मैं अपने अध्यापन के पेशे और जीवन से खुश हूं। मुझे लगता है कि अध्यापन के जरिए मैं कितने सारे निश्छल बच्चों से मिल पाता हूं, उनसे बातें कर पाता हूं और कुछ हद तक उनका हाथ पकड़ कर चल पाता हूं।’
वे जब इस प्राथमिक विद्यालय में आए तो यहां का माहौल काफी निराशाजनक था। लोगों को लगता था कि यह कोई घोटाला केंद्र है, जहां मिड डे मील, बच्चों के परिधान वगैरह का घोटाला होता है। स्कूल की दीवारें बेरंग थीं, माहौल उखड़ा-सा। डेढ़ सौ बच्चों का नामांकन था स्कूल में, लेकिन आते कम ही थे। उन्होंने इन सारी चुनौतियों के बीच पूरे उत्साह के साथ काम करना शुरू किया। चुनौतियों को लिखते जाते और उनके उपाय के बारे में लगातार सोचते रहते। सबसे पहला जरूरी काम था समुदाय का विश्वास अर्जित करना। उन्होंने समुदाय के लोगों से मिलना शुरू किया। उनसे स्कूल की बात नहीं करते। उनकी जिंदगी की, दिक्कतों की बातें करते और ज्यादा जानने की कोशिश करते। यथासंभव उनके साथ खड़े होने, उनके काम आने की कोशिश करते।
शिक्षक का काम सिर्फ स्कूल की दीवारों या पाठ्य-पुस्तकों में लिखे को बच्चों तक पहुंचाने भर का नहीं होता। शिक्षक समुदाय का भरोसा होता है। एक दिन समुदाय में उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर की कि स्कूल की दीवारों पर अच्छे से रंग करवाने का उनका मन है। अगले दिन स्कूल के ही एक बच्चे के पिता आए, बोले कि आप रंग मंगा दें, मैं कर दूंगा। वे पुताई का काम करते थे। यह पुताई के पैसे बचाने की नहीं, बल्कि समुदाय का विश्वास जीतने की बात थी।
उन्होंने अभिभावकों से कहा कि आप लोग कब तक अंगूठा लगाएंगे, हस्ताक्षर करना सीख लीजिए। हस्ताक्षर करना सीखने के बाद अभिभावकों को बहुत अच्छा लगा। यहां ज्यादातर कमजोर तबके के वाल्मीकि समाज के बच्चे हैं। शुरू में उनमें आत्मविश्वास बहुत कम था। हर काम करने से पहले उनमें एक संकोच रहता था। लेकिन धीरे-धीरे ये दीवारें टूटीं। अब उस स्कूल में जाति-वर्ग-धर्म की दीवारें चकनाचूर हो चुकी हैं।
वे बताते हैं कि एक बार मैंने देखा कि खाने के वक्त एक बच्चा उदास रहता है। मैंने उसे लगातार ध्यान से देखना शुरू किया। बाद में पता चला कि उस बच्चे की भूख ज्यादा है और भोजन माता उसे सीमित खाना ही देती है। कोई बच्चा भरपेट खाना न खाए तो काहे की शिक्षा, कैसा स्कूल! मैंने अगले दिन भोजन माता से बात की। उन्हें समझाया कि बच्चे का पेट ठीक से भरना बहुत जरूरी है। तभी तो वे मन लगा कर पढ़ेंगे, खेलेंगे, बेहतर इंसान बनेंगे! भूखे बच्चे को कौन-सा ज्ञान रास आएगा? उसे भरपेट खाना मिलने लगा। धीरे-धीरे उसके पढ़ने के स्तर में भी सुधार आने लगा है। छह साल की एक बच्ची थी कक्षा एक में। वह धीरे सीखती थी। कुछ अक्षर वह उलटे भी बनाती थी। मुझे समझ में आया कि इस बच्ची के साथ अलग से काम करने की जरूरत है। हम उसे अलग से पढ़ाते, उसके साथ वक्त बिताते। उसका आत्मविश्वास बढ़ाते। धीरे-धीरे वह बच्ची बेहतर सीखने लगी।
डोरीलाल जैसे शिक्षकों से मिल कर अहसास होता है कि स्कूल सिर्फ किताबें पढ़ने की जगह नहीं, इंसान बनने की जगह है। अगर हम एक-दूसरे से प्यार करना, सम्मान करना सीख लें, एक-दूसरे की मुश्किलों को समझना सीख लें तो रिपोर्ट कार्ड में दो नंबर कम भी आएं तो चलेगा! जिंदगी के रिपोर्ट कार्ड में मानवीय, संवेदनशील और प्यार से भरे होने के अंक जमा होना ज्यादा जरूरी है।
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