अरुणेंद्र नाथ वर्मा

नई पीढ़ी के उन विलक्षण प्रतिभासंपन्न बच्चों की खबरें, जिन्हें चार वर्ष की आयु में ही पूरी गीता कंठस्थ है या जिन्होंने तेरह वर्ष की आयु में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी कर ली है, अब अजूबा नहीं लगतीं। हर क्षेत्र में कम आयु के नए प्रतिमान स्थापित करने की होड़ लगी है। जल्दी पुष्पित-पल्लवित होने की दौड़ में तो अब पेड़-पौधे और फसलें भी शामिल कर ली गई हैं। रचनात्मक लेखन के क्षेत्र में भी धूमकेतु की तरह असाधारण प्रतिभा का प्रदर्शन करके कम आयु में ही अनंत में विलीन हो जाने वाली हस्तियों की संख्या छोटी नहीं है। अंग्रेजी के महानतम कवियों में लार्ड बायरन छत्तीस, पीबी शेली तीस और कीट्स छब्बीस की आयु में ही अमर काव्य का सृजन करके दिवंगत हो गए।

गल्पलेखिका मेरी शेली की ‘फ्रैंकेस्तीन’ उनके इक्कीस वर्ष के होने से पहले प्रकाशित हो चुकी थी और मूक-बधिर, दृष्टिहीन हेलेन कलर ने अपने जीवन की कहानी बाईस वर्ष की आयु में ही लिख डाली थी। भारत में अंगरेजी भाषा के उपन्यासकार चेतन भगत और आमिष त्रिवेदी की कम आयु में ही अभूतपूर्व सफलता में क्या संदेह। उनकी साहित्यिक उपलब्धियां तो बहस का विषय हैं, पर उनकी व्यावसायिक सफलता का क्या कहना। चेतन भगत के उपन्यासों की सत्तर लाख प्रतियां उनके चौंतीस वर्ष के होने के पहली ही बिक चुकी थीं। ‘शिवा’ तिकड़ी के प्रणेता आमिष त्रिवेदी चालीस साल के होने के पहले ही अपनी कृतियों की बाईस लाख प्रतियों का मूल्य साठ करोड़ रुपयों में वसूल चुके थे।

तारुण्य की ऐसी महिमा के आगे बुढ़ापे में लेखन का शौक पालने की कोई तुक है क्या? जीवन की संध्या आ चुकी हो, नाटक का अंतिम दृश्य आसन्न हो, तब दरवाजे पर होती दस्तक को भुला कर लेखन के क्षेत्र में हाथ-पैर मारने का क्या अर्थ? बूढ़े तोते का राम-राम कहना केवल तभी विद्रूप आकर्षित करता है, जब उसका प्रयोजन केवल आकर्षण का केंद्र बनना हो।

अगर उसे राम-राम कहने का सलीका मालूम था, बस मजबूरियों ने पहले ऐसा करने न दिया तो क्या उसे अवसर पाते ही अपने मन की कर लेने में संकोच करना चाहिए? जीवन भर नून-तेल-लकड़ी के चक्कर की सुलगती आग में जिनकी रचनात्मकता की चाहत झुलस कर रह गई हो, उन्हें इतना हक अवश्य है कि सारी अफरा-तफरी की आग ठंडी पड़ जाने के बाद, ऊपर जमी राख की परतें झाड़ कर अपने पहले प्यार को कुरेद कर कम से कम दिल ही बहला लें। जीवन का तराना जब एक बार स्थायी बोल शांत लय में दुहरा लेता है, तभी उसे संपूर्णता मिलती है।

साहित्यिक रचनात्मकता की बेल रोजमर्रा जीवन के संघर्षों, कुंठाओं, कठिनाइयों के ऊपर उठ कर जब पल्लवित होने का प्रयत्न करे तो उसके पुष्पित होने में संदेह कैसा। हजारों उदाहरण मिलते हैं ऐसे लोगों के जिन्हें जीवन के पूर्वार्ध में संघर्षों से जूझते हुए साहित्य साधना का अवसर नहीं मिल सका, पर जिन्होंने लगन नहीं छोड़ी। अंगरेजी / अमेरिकी साहित्य में ऐसे बहुतेरे उदाहरण हैं। पुलित्जर पुरस्कार विजेता उपन्यासकार जेम्स मिशेनर, जिनकी ‘टेल्स फ्रॉम द साउथ पैसिफिक’ एक अमर कृति है, ने जीवन के सातवें दशक में जाकर रचनात्मक लेखन प्रारंभ किया था। लारा वेल्डर को साठ साल तक विपन्नता से लड़ने के बाद ‘लिटिल हाउस’ शृंखला की कृतियों के सृजन का अवसर मिला। ‘जंपिंग द क्यू’ की लेखिका मेरी वेस्ली ने सत्तर की आयु के बाद लेखन से नाम कमाया और नब्बे साल के ऊपर होने तक लिखती रहीं।

साहित्य के दर्पण में समाज के हर तबके और व्यवसाय के व्यक्ति को अपनी छवि देख कर सुख और संतोष मिलता है। लगभग पूरा जीवन जी लेने वाले हर लेखक के पास, बशर्ते कि वह बेहद अंतमुर्खी न हो, ऐसी अनेक स्थितियां, चरित्र और कथानक होते हैं, जिन्हें चित्रित कर पाना बहुत सीमित अनुभवों और केवल कल्पना के बल पर लिखने वालों के लिए कठिन होता है। जीवन की दूसरी पाली में लिखने का खेल खेलने वाले के पास अनुभवों का एक वृहद् संसार होता है।

माना कि रचनात्मक लेखन मात्र संस्मरण लेखन नहीं होता, पर मानव मन की गहराइयों में झांकने के लिए जो अंतर्दृष्टि चाहिए, वह आयु के साथ और सक्षम होती है, धुंधलाती नहीं। जो अपनी रोजी-रोटी के लिए न लिखे, उसके पास कोई मजबूरी नहीं होती कि वह सर्वग्राह्य और लोकप्रिय रचना ही रचे। जीवन के अनुभवों की सुदृढ़ आधारशिला पर जो साहित्य पूरी स्वच्छंदता के साथ रचा जाए, उसके प्रभावशाली होने में संदेह कैसा। बंधनों से उन्मुक्त होकर लिखने वाले को भला क्यों ध्यान आएगा कि जीवन की घड़ी में तीसरा प्रहर है या चौथा। जीवन की संध्या ही तो स्वांत: सुखाय लिखने की असली वेला है।

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